रेगिस्थान के लोग आस्थाओं के अस्तित्व को सिद्ध करने हेतु अफवाहों की मनगढ़त कहानियों का सहारा लेते हैं। वे अपनी बहादुरी के मनगढ़त किस्से गर्व के साथ सुनाते हैं। वे अपनी बलिष्ठ बाजुओं से भूतों के साथ, रात भर खेली गई कुश्ती की कथा का सुबह कोटड़ी में विमोचन करते हैं। तथा अन्य सभी को विश्वास दिलाते है, कि वे भी बहादुरी की मिसाल हैं। वे भूत के उल्टे पैरो से लेकर उसके रंग-रूप तक का बारीकी से विवरण करते हैं। कहानियों का दौर चल ही रह था, कि इतने में एक दीपक के अचानक गायब होने की दूसरी कहानी शुरू कर दी जाती हैं। कि जब कभी वे अपनी गाय या भेड़-बकरी को ढूंढ़ने निकल जाया करते थे, तो रात के समय एक जलता हुआ दीपक उनका पीछा करता था और फिर वह अचानक ही वहां से गायब हो जाया करता था।
इतने में चिलम की फूंक लगाते हुए, अस्सी वर्षीय चुतरिंग भी अपनी कहानी सुनाते हैं, कि कैसे उन्होंने भूतों के पूरे झुण्ड को मात दी थी। और फिर सभी अपने-अपने बहादुरी के चर्चे चिलम की फूंक लगाते हुए बताने लगते हैं। तथा एक दूसरे की बहादुरी के बखाण करने लगते हैं। वे आस-पास के अन्य गांवों के भी चर्चे सुनाते हैं। वहां के बलिष्ठ बाजुओं की जमकर तारीफें करते हैं। वे समीपवर्ती गांव के किसी रतनिंग की कहानी बताते हैं, कि वे इतने बहादूर थे कि भूत की छाती पर रात भर बैठे रहे थे। भूत उनसे हाथ जोड़, विनती करते हुए अपनी जान बचाकर भागा था।
यह सब सुनते ही मुझसे रहा नहीं गया, मैंने तुरंत पूछ लिया कि क्या भूतों में भी जान होती है? और होती भी है तो क्या वे इतने विनम्र है, कि हाथ जोड़कर विनती करते है? इतना सुनते ही सारी घूरती हुई नजरें एक साथ बोल पड़ती है, कि अभी तू बच्चा है।, तूने दुनियाँ नहीं देखी हैं।, भूतों की बातें खुल्ले आम नहीं किया करते हैं। चल अब बहुत हो गयी है तैरे लिए कहानियाँ, जा हमारे लिए चाय लेकर आ। और चिलम के उठते धुँए के साथ-२ मुझे भी वहाँ से गायब कर दिया।
लेकिन वास्तविकता तो यह है कि लोग आस्थाओं को जुती की ठोकरों तल्ले बुनते हैं। झूठी प्रशंसा के चक्कर में अफवाहों को हवा देते हैं। वे विज्ञान की भाषा को पूर्णतः नकारते हैं। वे विज्ञान को मात्र किताबी ज्ञान बताकर उसकी व्यापक वास्तविकता को नकारते हैं। और अन्ततः अपनी ही बात पर अडिग रहते हैं। अगर कोई उनसे हिम्मत जुटाकर कह भी दे, कि हे! सज्जन आप गलत हो। तो वे उसे ज्यादा क़िताबों के पढ़ने का असर बताकर, पागल घोषित कर देते हैं।
#विज्ञानबनाममानव।
यह सब सुनते ही मुझसे रहा नहीं गया, मैंने तुरंत पूछ लिया कि क्या भूतों में भी जान होती है? और होती भी है तो क्या वे इतने विनम्र है, कि हाथ जोड़कर विनती करते है? इतना सुनते ही सारी घूरती हुई नजरें एक साथ बोल पड़ती है, कि अभी तू बच्चा है।, तूने दुनियाँ नहीं देखी हैं।, भूतों की बातें खुल्ले आम नहीं किया करते हैं। चल अब बहुत हो गयी है तैरे लिए कहानियाँ, जा हमारे लिए चाय लेकर आ। और चिलम के उठते धुँए के साथ-२ मुझे भी वहाँ से गायब कर दिया।
लेकिन वास्तविकता तो यह है कि लोग आस्थाओं को जुती की ठोकरों तल्ले बुनते हैं। झूठी प्रशंसा के चक्कर में अफवाहों को हवा देते हैं। वे विज्ञान की भाषा को पूर्णतः नकारते हैं। वे विज्ञान को मात्र किताबी ज्ञान बताकर उसकी व्यापक वास्तविकता को नकारते हैं। और अन्ततः अपनी ही बात पर अडिग रहते हैं। अगर कोई उनसे हिम्मत जुटाकर कह भी दे, कि हे! सज्जन आप गलत हो। तो वे उसे ज्यादा क़िताबों के पढ़ने का असर बताकर, पागल घोषित कर देते हैं।
![]() |
| फ़ोटो : चुतरिंग बा |

No comments:
Post a Comment