Monday, May 6, 2019

पीलू खाती धोरा धरती

मई-जून के दिन
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रेगिस्थान में मई-जून के महीने अपने संग लाते है, झुलसते गर्म दिन। मानो पारे ने तो कसम खा रखी हो, 45℃ से नीचे उतरना ही नहीं है। मई महीने के प्रारम्भिक हफ़्ते, रेत की आँधियों के शुरुआती दिन कहे जाते हैं। इन दिनों रेत से सनी हुई गर्म आँधियां, शुष्क वातावरण में चारों तरफ तैरती रहती हैं।
बावजूद इसके, रेगिस्तान का शुष्क वातावरण इन दिनों कैर-सांगरी,पीलू-कोकड़, पाका-खोखा जैसे अमूल्य मीठे फल व खाद्य व्यजंन प्रकृति-प्रदत करता है।
रेगिस्थानी इन दिनों, कैर-सांगरी की सब्जी खाने के शौकीन बन जाते हैं। बच्चे पूरा दिन झुलसती दोपहर में कैर व सांगरी चुगने में व्यस्त दिखते हैं। इन दिनों लगभग सभी घरों में यह सब्जी देखी जा सकती हैं। यहाँ तक कि पांच सौ किलोमीटर दूर से पधारे अध्यापकजी भी, अब इन सब्जियों के आदी बन चुके हैं। और इन दिनों बच्चों को ज्यादा मार्क्स देने लगते हैं।
सांगरी के विषय में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि इसे उबालकर और सुखाकर भविष्य में लम्बे समय के लिए आसानी से परिरक्षित किया जा सकता है।
कैर सांगरी चुगने से थोड़ी फुरसत मिली ही नहीं, कि बच्चों की मण्डली कमर में लौटा लटकाए हुए, साथ में बाल्टी, मग, चऊड़ी या ताम्बेड़िया लेकर जाळियों के झुंड में पूरा दिन भूखे-प्यासे, पीलू चुगने निकल जाती हैं। बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियां घर की चारदीवारी में कम और जाळियों पर लटकते हुए अधिक बिताते हैं। और सभी सांझ ढ़ले, पीलूओं से भरे बर्तनों के साथ हँसी-खुशी घर लौटते हैं।
अधिक संख्या में पीलू होने पर, इन्हें सुखाकर कोकड़ बनाई जाती हैं, जो कि रस-भरे पीलूओं का निर्जलीकृत रूप होता हैं। पीलू के प्रति अपार प्रेम को दर्शाती, रेगिस्थानी लघु दन्त-कथा का संक्षिप्त सारांश इस प्रकार हैं-
रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळियां रो ढ़िग।।
और इन बच्चों से थोड़ी कम उम्र के बच्चे, इन दिनों नीम की निम्बोळी से जेबें भरने में व्यस्त दिखाई देते हैं।
और अपने जीवनकाल की एक तिहाई उम्र पार कर चुका साफ़ाधारी वर्ग, अपना पूरा समय कोटड़ी में तास के पतों संग सूत कातने में बिताता है।
दिन ढ़लने के साथ-साथ लू की मार कम पड़ने लगती हैं। पारा कसम तोड़ने लगता हैं। रातें ठण्डी होने लगती हैं। और खुल्ला आसमान, तारों की रौशनी से जगमगाने लगता हैं। इन दिनों केवल रातें ही सुकून के सुरीले गीत गाती है, दिन तो खटारा गाड़ी पर सवार शहर लगते है।
(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)

(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)



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