Tuesday, December 15, 2020

झाँकती साँझ

 साँझ के सङ्गी घर लौट रहे,

मैं दरकिनार बैठा दरिया हूँ।


मेरा नीर नदी ले गई,

अब मात्र बुझता ज़रिया हूँ।


जग सङ्ग रंग ख्वाब उलझाए,

यह राज क्यों जान रहा हूँ।


मैं तो कल ही बुझ चुका था,

फिर आज क्यों जाग रहा हूँ?

भरी साँझ क्यों झांक रहा हूँ?

~ (०२-०९-२०२०)


Thursday, February 27, 2020

टूटता रेबन चश्मा

बाईसा के पिताजी सरकारी दफ़्तर में नोकर है। जिस वजह से बाईसा की पढ़ाई अन्य लड़कियों की तुलना में अधिक हुई है। पढ़ाई करके, अपने भाई की तरह सरकारी नौकरी लेना बाईसा की बचपन से ख्वाईश रही है। बाईसा दिल्ली के एक बड़े नामी कॉलेज से सोशियोलॉजी में पी.एच डी. भी करना चाहती है।
इस बार की बारहवीं बोर्ड परीक्षा में गांव के सात लड़को के साथ एग्जाम फाइट करने वाली बाईसा पहली लड़की है। सात लड़कों में से एक उसका भाई भी है। आज से पहले आठवीं के बाद की पढ़ाई का किसी लड़की ने नहीं सोचा था। तो जाहिर सी बात है, कि बाईसा अब पूरे गांव की कहानी बन गए है। बाईसा को अन्य लड़कियों की बजाय हर घर में अधिक महत्व दिया जाने लगा है। बाईसा यह देखकर मन ही मन काफी प्रसन्न है। लेकिन अपने मुँह मिट्ठू कैसे बने?, यह सोचकर झूठा दिखावा भी कर लेते हैं। चारों ओर से तारीफों के बंधते पुल देखकर, बाईसा ने अब घर का कामकाज करने से भी स्पष्ट मना कर दिया है। अब वह खुद को एक इंटेलेक्चुअल गर्ल मानने लगी हैं।
आज बारहवीं बोर्ड का रिजल्ट आने वाला है। बाईसा का भाई सुबह से ही काफी परेशान है। बाईसा अपने भाई व उनके साथियों की तुलना में थोड़ा कम नर्वस है। क्योंकि उन्हें विश्वास है कि वह उत्तीर्ण तो हो ही जाएगी। किन्तु जब रिजल्ट जारी हुआ, तो बाईसा अपनी कक्षा के सभी लड़कों को पछाड़कर 78% के साथ स्कूल टॉपर बन जाती है। खुशी से गदगद बाईसा के पिताजी ग्रामीणों व स्कूल अध्यापकों को मिठाई खिलाते हुए, बेटी की जीत का जश्न मनाने में व्यस्त हो जाते हैं। नजदीक के चौबीस गाँवो में इतने अंक प्राप्त करने वाली बाईसा पहली छात्रा होती है। जिस कारण हर गाँव-मोहल्ले से लेकर दूर-दराज के रिश्तेदारों तक से बाईसा को बधाइयाँ मिलने लगती हैं।
प्रधानाचार्य महोदय ने इस खुशी को दुगना करने के लिए, अगले ही दिन एक कार्यक्रम भी फिक्स कर दिया है। जिसमें कुछ पत्रकार से लेकर, आस पड़ोस की नामी हस्तियों व बारहवीं बोर्ड के सभी विद्यार्थियों को विद्यालय प्रागण में इनवाइट किया है। प्रचार-प्रसार हेतु पेम्पलेट भी छपवाए गए है, जिसमें आस पड़ोस के सभी ग्रामीणों को कार्यक्रम में शरीक होने हेतु आग्रह किया गया है। आसपास के सभी ग्रामीण बाईसा को देखने व उनके उद्बोधन को सुनने हेतु आतूर हो उठते हैं।
 अगले दिन कार्यक्रम में आसपास के करीबन तीस गाँवों से छात्र वर्ग, युवा व बुजुर्ग पधारते है। विद्यालय प्रागण आसपास से पधारे जनमानस से खचाखच भर जाता है। मंचासीन अतिथि भी बिना किसी विलम्ब, अपने-२ स्थान पर विराजित हो जाते है। बारहवीं के छात्र आज मंच के साइड में, कुर्सियों पर प्रसन्न मुद्रा में दिख रहे होते हैं। किन्तु बाईसा अभी तक नहीं पधारे है, जिनका सबको बेसब्री से इंतजार है।
थोड़ी ही देर बाद बाईसा गाड़ी से उतरते है। तथा सीधी-खड़ी नजरों के साथ मंच की ओर अग्रसर होते है। मंच पर पहुँचने तक, तालियों की गड़गड़ाहट से पाण्डाळ गुंजायमान हो जाता हैं। प्रधानाचार्य व मंचासीन आतिथ्य बाईसा का स्वागत करते हैं। तथा विधिवत रूप से कार्यक्रम की शुरुआत करते हैं। मंचासीन अतिथियों के उद्बोधन के पश्चात, बाईसा को उद्बोधन हेतु आग्रह किया जाता है। बाईसा बेबाक होकर, अपने पर्स में से रेबन का चश्मा निकालते हुए, आँखों पर लगा लेती हैं। बुजुर्ग मेहमान यह देखकर आपस में फुसफुसाहट शुरू कर देते है। युवा वर्ग मुस्कुराते गोरे रंग पर काले चश्में के सौंदर्य को निहारने में व्यस्त हो जाते हैं। छोटे बच्चे आज डर के कारण सून होकर चुपचाप उद्बोधन सुनते रहते हैं।
बाईसा के इस अतरंगी अंदाज से, प्रेरणादायक उद्बोधन की समाप्ति पर तालियों की गड़गड़ाहट से विद्यालय की दीवारें पुनः सर्जित हो उठती हैं।
अगले दिन अखबार में बाईसा की चश्में संग छपी फ़ोटो चर्चा का केंद्र बन जाती है। सब अपनी-२ विचारधाराओं को जीवित रूप देने लग जाते हैं। कल के अतरंगी अंदाज में उद्बोधन के पश्चात, आज के अखबार की मुख्य सुर्खियों में बाईसा की चर्चा, महिला वर्ग में आग की तरह फैल जाती है। आसपास से जान पहचान व अनजान, सभी बाईसा से मिलने को लड़ी लगाए आतूर हो जाते हैं। कुछ दिनों तक आस पड़ोस व रिश्तेदार यूँही घर आकर, बधाइयों की टोकरी भरते रहते हैं। अब बाईसा आसपास की कई लड़कियों की प्रेरणास्रोत भी बन चुकी है। कई माता पिता स्वतः ही बलिका-शिक्षा को लेकर अपना नजरिया भी बदल चुके है।
करीबन दो महीनें बधाइयां पाने के बाद, बाईसा दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में आगे की पढ़ाई हेतु आवेदन करती है। और कुछ ही दिनों बाद यूनिवर्सिटी की दूसरी लिस्ट में बाईसा का नम्बर भी आ जाता है। बाईसा खुशी-२ आगे की पढ़ाई हेतु, वहाँ शिफ्ट होने की तैयारियों में जुट जाती है।
लेकिन बाईसा जिस समाज से है, वह बाईसा के इस डिसीजन से काफी परेशान हो जाता है। बाईसा का समाज, आज भी बारहवीं के बाद की बालिका-शिक्षा को अपराध मानता है। तथा इस उम्र तक बच्ची की शादी कर देने का पक्षधर है। अधिकतर बुजुर्ग व युवा पीढ़ी बाईसा के अकेले दिल्ली शहर में रहकर, पढ़ाई करने को लेकर आपत्ति जताते हैं। कल तक बधाइयाँ बाँटने वाले समाज-सेवक, आज मिलकर बाईसा के पिताजी से उन्हें आगे की पढ़ाई करवाने हेतु मना करते हैं। आज-पड़ोस से लेकर नजदीकी गांवों तक, बाईसा के दिल्ली प्रवास को लेकर कानाफूसी भी शुरू हो जाती है। कुछ इसे बाईसा की नासमझ, तो कुछ दिल्ली की हवा पर दोष मांडने लग जाते हैं। किंतु बाईसा समाज व अन्य के दोषारोपण को इग्नोर करते हुए, सबके सामने चौराहे पर रेबन का चश्मा लगाते हुए, दिल्ली के लिए बस द्वारा कूच कर लेती हैं।
बाईसा के इस जिद्दी रवैये को सब अपने-ऊपर अपमान की तरह लेते हैं। तथा उन पर व उनके माता-पिता पर दोषपूर्ण ऊंगलियाँ उठाना शुरू कर देते हैं।
जब बाईसा के दिल्ली गमन की बात का पता पुराने रिश्तेदारों को लगता है, तो उनके सगे सम्बन्धी तक उनसे मुँह मोड़ लेते हैं। उनके परिवार को बुरा-भला कहने लगते हैं। और धीरे-धीरे घर आना-जाना भी बंद कर देते हैं। समाज में कानाफूसी के चलते नजदीकी व पुराने रिश्तेदार, रिश्तेदारी करने से भी मुकर जाते हैं। जिस कारण बाईसा के लिए समाज से दूरदराज के रिश्ते भी आने लग गए हैं। जहाँ उनके पिताजी रिश्तेदारी नहीं करना चाहते थे, किंतु समाज के पुराने रिश्तेदारों को इस प्रकार मुँह मोड़ते देख, वे अपनी बेटी की सगाई, नए आए रिश्तों में से एक के साथ फिक्स कर देते हैं। जो कि एक पढ़ा लिखा परिवार होता है, तथा उनका बेटा भी, दिल्ली के एक नामी कॉलेज से ग्रेजुएट भी होता है।
बाईसा अब अधिकतर दिल्ली में ही रहने लगे थे। कभी-कभार ही गाँव आया करते थे। लेकिन जब भी गांव आते, पुनः चर्चा का केंद्र बन जाते थे। ग्रामीण परिवेश के छोटे से मार्केट में अकेले, जीन्स पहनकर, चश्मा लगाते हुए कुछ खरीददारी करने पर, पूरे समाज को आफ़त आ जाती थी। वैसे इस बात पर बाईसा से तर्क-वितर्क करने से हर कोई मुँह मोड़ लेता था। और सब उनके पिताजी को समझाने चले जाते थे। उनके बेबाक़ ढ़ंग से बिना डरे हर किसी को सटीक जवाब देने के कारण, हर छोटा-बड़ा उनसे नाराज होने लगा था। लोगों की उनके परिवार के प्रति बढ़ती नाराजगी को देखते हुए, बाईसा ने अपने आप को एक कमरे व लेपटॉप तक सीमित कर दिया। तथा कुछ समय पश्चात से गांव आना भी बंद कर दिया।
बाईसा के गांव न आने पर, बातें ओर बढ़ जाती है। लोग इस बात को लेकर उनके पिताजी को बार-२ ताने मारने लग जाते है। दोषारोपण को ओढ़ता हुआ समय-रथ धीरे-२ आगे बढ़ता है, और बाईसा की ग्रेजुएशन पूरी हो जाती है। जैसे ही ग्रेजुएशन पूरी होती है, पिताजी बाईसा की शादी फिक्स कर देते है। लेकिन बाईसा इस बात से नाखुश है। वह अपने पी.एच डी. के सपने को अकेले, साकार जीना चाहती है। किन्तु समाज के खुलते मुंह को बंद करने के लिए बाईसा, पिताजी की हामी में हाँ भर देती है।
अपनी शादी में पिताजी की ताउम्र कमाई से खरीदे दहेज को देने से बाईसा पूरजोर विरोध भी करती है, किन्तु यहाँ समाज की कुरुतियाँ पढ़ाई पर हावी हो जाती है। और बाईसा न चाहते हुए भी दहेज के साथ, बिना किसी दिल्ली के दोस्त को बुलाए, उखड़े मन से शादी कर लेती है।
शादी के पश्चात बारात हर्षोल्लास के साथ घर लौटती है। नई दुल्हन का स्वागत सत्कार किया जाता है। सारी रीति-रश्में निभाई जाती है। जिनका बाईसा को कुछ भी पता नहीं होता है। इस बात पर बाईसा की जोरदार खिल्ली भी उड़ाई जाती हैं। पूरा ससुराल दिल्ली से पढ़ी-लिखी दुल्हन को देखने घर आता है। बाईसा को उनकी बचपन की सहेलियों ने समझाया था, कि ससुराल में जितना लंबा घुँघट खींचोगी, उतनी ही ज्यादा इज्जत पाओगी। इसलिए रश्मों पर खिल्ली उड़ने के पश्चात, बाईसा ने मुख पर लम्बा सा घुँघट खींच लिया है। धीरे-२, पूरे गाँव से ग्रामीण औरतें, दुल्हन के सौंदर्य का बखान करती हुई, बधाइयाँ बांटकर पुनः अपने-२ लौटती जाती हैं। इस बीच कई बार बाईसा घुँघट खींचना भूल जाती थी, तो उनकी नणद व भुआजी नाराजगी जताते हुए बाईसा को अकेले में समझाते थे। अभी शादी को चौबीस घण्टे भी नहीं हुए थे, कि बाईसा द्वारा दोहराई गलतियों की टोकरी, शाम के समय गिनवाई भी जाने लगती है। किन्तु बाईसा ससुराल पक्ष की इन बातों को इग्नोर करते हुए, ईधर-उधर अपने पति को झाँक रही होती है। क्योंकि उन्हें विश्वास है, कि कोई पढ़ा लिखा, मेरे जैसा ही मुझे समझ पाएगा। कि मैं यह सब ओर अधिक नहीं कर पाऊँगी। किन्तु बन्ना तो आज सुबह ही अपने कॉलेज दोस्त की शादी में शरीक होने हेतु घर से निकल चुके थे।
कुछ ही देर पश्चात पड़ोस से पता चलता है, कि बन्ना की वापस घर लौटते समय, एक्सीडेंट में ऑन स्पॉट मृत्यु हो जाती है। हर्षोल्लास में मुग्ध पूरा गाँव शौक में डूब जाता हैं। चारों ओर से केवल रोने व चीखने की ही आवाजें सुनाई पड़ती हैं। बाईसा के हाथों की अभी मेहन्दी भी नहीं सूखी थी, और वह मात्र चौबीस घंटे के भीतर विधवा हो जाती है। बाईसा के सारे गहने, हाथ की चूड़ियां, माथे का सिन्दूर हमेशा के लिए पोंछ दिया जाता हैं। और ताउम्र के लिए सफेद रङ्ग ओढ़ा दिया जाता हैं। जिसे वह चाहकर भी रंगीन नहीं कर पाएगी। यह बात वह बचपन से ही, अच्छी तरह समझती है।
पढ़े-लिखे नए रिश्तेदार बाईसा पर तानों की झड़ी लगा देते हैं। उन्हें घर, परिवार व समाज पर कलंक बताते हैं। दाह-संस्कार के दो दिन बाद से ही घर-परिवार व आस-पड़ोस के सदस्य, उन्हें आते-जाते खरी-बुरी बातें सुनाने लग पड़ते हैं। शोकागुल परिवार सारी आफ़तों का दोष, केवल बाईसा के माथे धर देता हैं। किन्तु बाईसा किसी को कोई जवाब नहीं देती हैं। उनकी सारी शिक्षा घर, परिवार व समाज के झूठे दोषारोपण व प्रतिबंधित नियमों के आगे विफल हो जाती है। वह एक कोने में अपने आप को समेटकर, खिड़की से चाँद-तारों को ताकती हुई किसी अन्य दुनियाँ के ख्यालों में भूखी-प्यासी खो जाती हैं।
शादी के सातवें दिन, बाईसा दहेज में आए हुए नए रेबन के चश्मे को पहनते हुए, स्वयं को बन्द कमरे में फाँसी लगा लेती हैं। पूरे समाज की सोच पर शोक छा जाता है।

Friday, January 10, 2020

अन्यथा, कुत्ते मूत रहे होंगे।

धर्म की आड़ में इंसानियत मर रही हैं, क्योंकि सबने अपनी आत्मा जबरदस्ती अपने-२ धार्मिक देवता, स्थल को सौंप रखी है। और उसकी रक्षा का जिम्मा अपने माथे चिपका लिया है। कब कोई धर्म पर उंगली उठाए, और प्रतीक्षारत सेवकगण को माथा फोड़ने का मौका मिल जाए, की बेसब्री से प्रतीक्षा सबके मानस पर घाव कर गई हैं।
सबने अपने ईश्वर को इंसानियत से कई गुणा ऊपर विराजित कर रखा है। उसे विश्वास का नाम देकर, असल विश्वास को गहरी खाई में धकेल दिया हैं।
राजनीति के चोचलों से लेकर तपस्या भंग के पव्वे तक का खेल, इन्हीं पदचिन्हों से गुजर रहा है। सब एक धोखे का शिकार बन चुके है, जिसे इंसान ने इंसान को सिखाया है। और आगे भी सीखाने में अंधाधुंध लगा पड़ा है। मानव अपना असल उद्देश्य भूलकर, भ्रम की दुनिया में इतना 'सुन' हो चुका है, कि उसे लहूलुहान सच की चीखें तक सुनाई नहीं दे रही है।
यह जिस तरह का खेल फ़िलहाल चल रहा है, उसे देखते हुए पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं, कि मानव अपना अस्तित्व जल्द ही खो देगा। बस बची रह जाएगी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे की भव्य दीवारें। जिन पर कुत्ते मूत रहे होंगे।

(पत्ती से पत्थर की ओर गमन)

Friday, January 3, 2020

भोपियों का प्रोपेगैंडा

सुबह स्कूल की घंटी बजती है। सभी बच्चे स्कूल की ओर चल पड़ते हैं। कुछ ने तेज रफ्तार पकड़ी हुई है, तो कुछ नन्हे कदम पीछे-पीछे भाग रहे हैं। अधिकतर लड़के लड़कियों के कदमों का पीछा करते हुए चल रहे हैं। तो कुछ इन्हें दूर से घूरते हुए चल रहे हैं। चार-पांच लड़को का एक समूह तो नियमों को दरकिनार रखते हुए, पीछे की तरफ चाहरदीवारी को लांघते हुए स्कूल में एंट्री कर रहा है।
किन्तु इन सबके बीच आज झबरा कहीं नहीं दिख रहा था। पहले तो मन में आया कि वह हमेशा की तरह आज भी लेट हो गया होगा, परन्तु अन्ततः वह कहीं नज़र नहीं आया। "झबरा"- जो कि तीसरी कक्षा का छात्र है। और वह हमेशा अकेला, अपनी ही धुन में खोया हुआ, सबसे अंतिम पंक्ति में विद्यालय जाता है। वह प्रार्थना खत्म होने के पश्चात हमेशा चाहरदीवारी को लांघकर, अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर जाते हुए छात्रों के झुण्ड में, नमक की तरह घुल जाता था। और सज़ा से बच जाता था। यह उसका डैली रूटीन बन गया था। पिछले साल उसने मात्र तीन प्रार्थना-सभा ही अटेंड की थी।
हाँ, कभी-कभार वह पकड़ा जाता था, और बहाना न बन पाने पर उसकी पीटाई भी होती थी। उसके पिताजी ने भी अध्यापकों को पीटने की पूर्ण छूट दे रखी थी। कभी-कभी तो वह बिना गलती के भी सज़ा का शिकार बन जाता था। जिस कारण से उसके सभी सहपाठी, उसे चिढ़ाते रहते थे। इसलिए वह सबसे अलग एक कोने में ही बैठता था। किसी से कुछ बात नहीं करता था।
आज वह स्कूल जाता कहीं नज़र नहीं आया, तो पूछने पर पता चला कि कल रात उसे बुखार आ गया है। और उसके माता-पिता इसे (बुखार को) किसी दैवीयशक्ति का प्रकोप बताते हुए, आज उसे गांव की ही एक भोपी को दिखाने (पूछने) हेतु ले गए है। "भोपी", जो कि स्वयं पिछले डेढ़ साल से बीमार है, किन्तु अन्य किसी की भी समस्या का तुरंत समाधान करने का दावा करती रहती है। और वह स्वयं को साक्षात दर्शन दिए हुए, अपनी आराध्य देवी की प्रतिनिधि मानती है। लोग उसे काफ़ी हद तक सच्चा मानते हैं।
आज भी भोपी को बुखार के बारे में बताए जाने पर वह अपनी आराध्य देवी के मन्दिर में से गेंहू के दस-बारह दाने (आखा) लेकर, आंखे बंद करते हुए मन ही मन कुछ चिंतन-मनन करने लग जाती है। फिर इन 'आखो' को हाथ में इधर-उधर टटोलते हुए, वह झबरे के परिवार को आने वाली अगली शुक्ल पंचमी को ग्यारह रुपये की प्रसाद, इस मन्दिर में चढ़ाने को बताती है। सभी हाथ जोड़कर 'हाँ' में गर्दन झुकाते हैं।


फिर वह बताती है, कि आज रात को एक किलोग्राम गेंहू के दलिए का हलवा तथा दो बाजरे की रोटी तेल में भिगोकर व साथ में दो-दो स्पून नमक-मिर्च लेकर, इसे (भोज्य व्यंजन) झबरे को आंगन के मध्य भाग में बिठाकर उसके सिर पर सात बार घुमाते हुए, बिना पीछे मुड़े हुए घर से करीबन तीन-सौ मीटर दूर एक निश्चित व सुनसान जाल के वृक्ष में फैंकने को कहती हैं। और वह बताती है, कि इस प्रकार देवी-शक्ति के प्रभाव से भूत-प्रेत की आत्मा (जो कि झबरे में बुखार के रूप में प्रविष्ट हुई है) उस भोज्य सामग्री के पीछे-२ चली जाएगी। तथा वह आज ही पूर्णतः स्वस्थ हो जाएगा।
और वह एक पूर्व में बना-बनाया हुआ "मादळिया" (जो कि चांदी का है तथा जिसकी बाज़ार कीमत सौ रुपये हैं) झबरे के गले में बांध देती है। और दावा करती है कि इसे पहने रखने पर भूत-प्रेत की आत्मा पुनः झबरे के शरीर में कभी नहीं प्रविष्ट कर पाएगी। उसकी यह सभी बातें झबरे का पूरा परिवार हाथ जोड़कर ध्यान से सुन रहा था। और फिर झबरे के पिताजी चार सौ रुपये भेंट स्वरूप भोपी को, तथा सौ रुपये उस मंदिर के कलश में डालते हुए, दोनों हाथ जोड़कर वहां से विदा होने की आज्ञा लेते है। फिर सभी वहां से हंसी-खुशी पुनः घर को लौट जाते हैं।
दिन ढ़ल जाने के पश्चात सम्पूर्ण व्यंजन सामग्री तैयार कर, पूरी प्रक्रिया भोपी के कहे अनुसार दोहराई जाती हैं। झबरा सुबह से ही इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को एक अनजान की तरह इधर-उधर सबकी आंखों में झांकते हुए, चुपचाप देखता रहता है। और कुछ नहीं बोलता है। किन्तु झबरे के शरीर का तापमान भोपी के कहे अनुसार अब भी घटने की बजाय ओर अधिक बढ़ता ही जा रहा था। और रात ढ़लने के साथ-२ ओर तेज होता गया। इससे उसके माता-पिता रात-भर परेशान रहे और पलक तक नहीं झपकी।
सुबह होते ही झबरे के पिताजी पुनः उस भोपी के पास जाते है। तथा बुखार नहीं उतरने का दुख सुनाते हैं। भोपी मंदिर में से कुछ 'आखे' लेकर, उन्हें कुछ समय तक हाथ में इधर-उधर हिलाकर देखती हुई कहती है, कि अब आगे उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। उसे इस समय अपनी आराध्य दैवी-शक्ति का कोई आदेश नहीं मिल रहा है। इसलिए वह फिलहाल कोई सहायता नहीं कर पाएगी। अगर कोई दैवीय-शक्ति आदेश हुआ तो वह यह आज्ञा घर बैठे ही फ़ोन पर बता देगी।
झबरे के पिताजी द्वारा अन्य कोई सुझाव पूछे जाने पर, वह(भोपी) झबरे के परिवार को गांव से बारह किलोमीटर दूर एक अन्य भोपी से मिलने की सलाह देती है। और बताती है, कि वह भोपी आपकी तुरंत सहायता कर देगी। यह नई वाली भोपी इस पूरे क्षेत्र की जानी-मानी भोपी है। जिसे सभी "भोपी-माँ" के नाम से जानते हैं।


झबरे के पिताजी अब बारह किलोमीटर दूर इस भोपी से पूछने हेतु छः सौ रुपये देकर, गाड़ी किराए पर लाते है। और सपरिवार भोपी से मिलने हेतु निकलते हैं। झबरे के माता-पिता, इस 'भोपी-माँ' के परिवार हेतु तीन किलोग्राम केले व दो चॉकलेट्स के पैकेट, भेंट स्वरूप खरीदते हैं। भोपी के घर पहुंचने पर वे पाते है, कि वहां पर पहले से ही चार-पांच दूर-दराज से यात्रीगण, अपनी-२ समस्याएं निपटाने हेतु आए हुए हैं। उन सबको भोपी द्वारा वहां से फ्री करने के बाद, झबरे के परिवार का नम्बर लगता हैं। झबरे की माताजी भोपी को फल व चॉकलेट भेंट करते हुए सम्पूर्ण घटना का विवरण सुनाती है। ततपश्चात भोपी मंदिर में से दो चुटकी 'आखे' लेती है, तथा उन्हें हाथ में इधर-उधर टटोलते हुए धूणने (वाइब्रेट मॉड में आना) लग जाती है। तथा झबरे के इस बुखार का दोष, दैवीय-शक्ति प्रकोप बताती है। तथा इस विपत्ति से छुटकारे के लिए अगले महीने की पूर्णिमा को झबरे के ननिहाल में स्थित देवी के मंदिर में बकरे की बलि चढ़ाने को कहती है। तथा साथ में इक्यावन रुपये की प्रसाद व एक स्वरूप नारियल चढ़ाने को कहती है। झबरे का परिवार हाथ जोड़कर, आज्ञा के पालन का भरोसा दिलाता हैं। फिर एक अन्य औरत आकर मुट्ठी भर गेंहू के दाने, भोपी के सिर पर छिड़कती है। जिससे भोपी का कम्पन(वाइब्रेट) मॉड तुरंत ऑफ हो जाता है। अर्थात वह धूणना बन्द कर देती है।
और फिर वह भोपी मन्दिर के अगरबत्तियों की राख (जिसे खाक कहते हैं), चुटकी में लेकर झबरे के मुंह में देती हुई, इसे निगलने को कहती है। वह झबरे की माताजी को बताती है, कि इससे झबरे का बुखार आज ही पूर्णतः ठीक हो जाएगा। बस आप समय-समय पर मेरी यानी देवी की आज्ञा का पालन करती जाएं, जिससे आपके परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। फिर झबरे की माताजी भोपी के पैर छूते हुए, सौ रुपये नासका के रूप में भोपी के हाथ में थमा देती है। तथा उनकी सारी बातें मानने का वचन देती हैं।
और पूरा परिवार मन्दिर के सामने हाथ जोड़ते हुए, वहाँ से विदा होने की भोपी से आज्ञा लेता हैं। विदा होते-होते, झबरे के पिताजी अपनी पत्नी के कहने पर मन्दिर के कलश में दो सौ रुपये भेंट स्वरूप चढ़ा देते है। और भोपी के कहने पर भोपी के नम्बर भी भोपी के पति से ले लेते है। पूरा परिवार लौटते समय, बीच रास्ते गाड़ी में भोपी के ही गुणगान गाए जा रहा था, कि ऐसी दयालू और मददगार औरत आज के दौर में कम ही मिलती हैं। किंतु झबरे का बुखार अब भी कम होने की बजाय ओर बढ़ता ही जा रहा था। घर पहुंचते ही झबरे को उल्टियाँ होनी शुरू हो जाती है।


और रात होते-होते बुखार व उल्टियाँ ओर तेज होती गई। गुजरते वक्त संग बुखार के इस प्रकार ओर तेज होते जाने से झबरे के माता-पिता की परेशानियाँ भी बढ़ती गई। अन्ततः मध्यरात्रि को झबरे के पिताजी पुनः गाड़ी किराए पर लाए तथा पूर्व में पत्नी के कहने पर, फिर आपसी सहमति से झबरे को लेकर भोपी के पास जाने लगे।
झबरे की माताजी ने बीच रास्ते भोपी को फ़ोन किया, किन्तु भोपी ने फ़ोन अटेंड नहीं किया। तो गाड़ी के ड्राइवर ने झबरे के पिताजी को बताया, कि अभी भोपी सो रही होगी। वैसे भी वह रात्रि में कोई जवाब नहीं देगी। अभी एक बार हॉस्पिटल चलते है, फिर भी यदि झबरा ठीक नहीं हुआ, तो सुबह होते ही भोपी के पास चलेंगे। इस बात पर झबरे के पिताजी ने तो 'हाँ' में इशारा किया, किन्तु झबरे की माताजी उनके इस निर्णय से खुश नहीं थी। उनका कहना था कि बिना भोपी की आज्ञा लिए हॉस्पिटल जाने से भोपी-माँ और दैवीय शक्ति दोनों नाराज होगीं तथा घर-परिवार के अन्य सदस्यों को भी उनके प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। किन्तु झबरे के पिताजी, सब अनसुना करते हुए गाड़ी के ड्राइवर की बात को प्राथमिकता देते है और हॉस्पिटल चले जाते हैं।
डॉक्टर ने झबरे का चेक-अप किया तथा मलेरिया बुखार बताया। उसने झबरे को तीन बिस्किट के साथ एक टैब्लेट तथा दो ग्लूकोज की बोतल में चार इंजेक्शन दिए। जिससे झबरे की तबियत में सुधार होने लगा। डॉक्टर ने तीन दिन का रेगुलर कोर्स दिया। तथा तीन दिन तक नियमित चेक-अप की सलाह दी। सुबह होते-होते झबरे का बुखार कम पड़ गया। यह देखकर झबरे के माता-पिता खुश हो गए। उनकी आंखे खुशी से गीत गाने लग गई, किन्तु वे कुछ भी बोल नहीं पाए। बस एक-दूसरे को देखते हुए मन ही मन मुस्कान बिखेर रहे थे।
घर वापस लौटते समय, खुशनुमा माहौल को देखते हुए गाड़ी के ड्राइवर ने झबरे के पिताजी को उसकी स्कूल भी बदलने की सलाह दी। और उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकारने का वचन दिया। यह सुनकर झबरे की खोई मुस्कान लबों पर तैर आई। वह पूरे रास्ते एक मीठी मुस्कान के साथ गाड़ी के ड्राइवर को, एकटुक नज़रों से बस देखे जा रहा था। न-जाने क्या ढूंढ़ रहा था?...

Wednesday, January 1, 2020

अन्तिम इक्कतीस

दोस्त सिटी मार गुनगुना रहे है ट्वेंटी-ट्वेंटी।
ब्लैक डॉग की सात बोतले, अब हो गई है खाली।।

मुर्गे की बांग बोलेगी, सुबह नया साल।
जिसमें होगा संकल्पित ऊर्जा का नया संचार।।

किन्तु भूल गए नशे में धुत सारे दोस्त।
जिस की बांग पर जागना था सुबह,
उसी को रात गटक गए चारों दोस्त।।

Thursday, December 19, 2019

हॉस्टल लाइफ

• गोलमटोल सपनों की धुँधली दोस्त होती है हॉस्टल लाइफ
• बिन होश, जोश उगलती खरी डोर होती है हॉस्टल लाइफ
• सर्द महीनों सी उगती, छटकती धूप होती है हॉस्टल लाइफ
• सैकड़ों छुपे अरमानों को पंख बाँटती है हॉस्टल लाइफ
• सहमी सोच को बुलंद कण्ठ सौंपती है हॉस्टल लाइफ
• एक कदम पीछे सैकड़ों सिर जोड़ती है हॉस्टल लाइफ
• थाली के सातों कवे, एक साथ गटकती है हॉस्टल लाइफ
• तूं-तड़ाक से सभ्य-बोल, बुलवाती है हॉस्टल लाइफ
• बिखरे मनकों से अटूट माला बुनती है हॉस्टल लाइफ
• रूठे सपनों के नाम मंजिल ढूँढती है हॉस्टल लाइफ
• नन्हें कदमों से अजय-धावक पछाड़ती है हॉस्टल लाइफ
• "इनशॉर्ट, बालक को समाज बनाती है हॉस्टल लाइफ"



Saturday, July 27, 2019

हाउड़ो

यह रेगिस्तान में प्रयुक्त होने वाला एक विशिष्ट शब्द है। जिसका उपयोग शिशु को आवश्यक व अनावश्यक कार्यों को रोकने या करवाने हेतु प्रयुक्त किया जाता हैं।
यह शब्द शिशुओं की खुशी, जिज्ञासा, इच्छा, क्रियाशीलता, उत्सुकता व अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता हैं। हाउड़े (एक काल्पनिक, काली-डरावनी शक्ति) का डर फैलाकर, बच्चे के व्यवहारिक अधिगम की ओर बढ़ते कदमों को पीछे खींचा जाता हैं। जिससे सभी जाने-अनजाने में अनजान बनते हैं। बस अपना काम निकालने के चक्कर में, वे बच्चे के मन में उम्रभर के लिए, एक डर पैदा कर देते हैं।
शैशवावस्था में शिशु अपने माता-पिता, रिलेटिव्स, परिवार या समाज के व्यक्तियों में से हाउड़े का जिक्र जरूर सुनता हैं। और उसे सच मानता हैं, क्योंकि यह इस अवस्था की एक अनुकरण-अधिगम विशेषता हैं। और एक अनजान,अज्ञात डर का ता-उम्र के लिए शिकार हो जाता हैं। प्रायः इसी डर के शिकार की वजह से बच्चे भूत, प्रेत, आत्माओं को भी मानने लग जाते हैं। जिसका खामियाजा उन्हें पूरी उम्र चुकाना पड़ता हैं।
वास्तविकता में, हाउड़े शब्द की कोई सत्यता नहीं होती हैं। यह महज एक वहम और काल्पनिक मनोदशा होती हैं। जिसका शिकार कुपोषण से कई ज्यादा घातक होता है।