बाईसा के पिताजी सरकारी दफ़्तर में नोकर है। जिस वजह से बाईसा की पढ़ाई अन्य लड़कियों की तुलना में अधिक हुई है। पढ़ाई करके, अपने भाई की तरह सरकारी नौकरी लेना बाईसा की बचपन से ख्वाईश रही है। बाईसा दिल्ली के एक बड़े नामी कॉलेज से सोशियोलॉजी में पी.एच डी. भी करना चाहती है।
इस बार की बारहवीं बोर्ड परीक्षा में गांव के सात लड़को के साथ एग्जाम फाइट करने वाली बाईसा पहली लड़की है। सात लड़कों में से एक उसका भाई भी है। आज से पहले आठवीं के बाद की पढ़ाई का किसी लड़की ने नहीं सोचा था। तो जाहिर सी बात है, कि बाईसा अब पूरे गांव की कहानी बन गए है। बाईसा को अन्य लड़कियों की बजाय हर घर में अधिक महत्व दिया जाने लगा है। बाईसा यह देखकर मन ही मन काफी प्रसन्न है। लेकिन अपने मुँह मिट्ठू कैसे बने?, यह सोचकर झूठा दिखावा भी कर लेते हैं। चारों ओर से तारीफों के बंधते पुल देखकर, बाईसा ने अब घर का कामकाज करने से भी स्पष्ट मना कर दिया है। अब वह खुद को एक इंटेलेक्चुअल गर्ल मानने लगी हैं।
आज बारहवीं बोर्ड का रिजल्ट आने वाला है। बाईसा का भाई सुबह से ही काफी परेशान है। बाईसा अपने भाई व उनके साथियों की तुलना में थोड़ा कम नर्वस है। क्योंकि उन्हें विश्वास है कि वह उत्तीर्ण तो हो ही जाएगी। किन्तु जब रिजल्ट जारी हुआ, तो बाईसा अपनी कक्षा के सभी लड़कों को पछाड़कर 78% के साथ स्कूल टॉपर बन जाती है। खुशी से गदगद बाईसा के पिताजी ग्रामीणों व स्कूल अध्यापकों को मिठाई खिलाते हुए, बेटी की जीत का जश्न मनाने में व्यस्त हो जाते हैं। नजदीक के चौबीस गाँवो में इतने अंक प्राप्त करने वाली बाईसा पहली छात्रा होती है। जिस कारण हर गाँव-मोहल्ले से लेकर दूर-दराज के रिश्तेदारों तक से बाईसा को बधाइयाँ मिलने लगती हैं।
प्रधानाचार्य महोदय ने इस खुशी को दुगना करने के लिए, अगले ही दिन एक कार्यक्रम भी फिक्स कर दिया है। जिसमें कुछ पत्रकार से लेकर, आस पड़ोस की नामी हस्तियों व बारहवीं बोर्ड के सभी विद्यार्थियों को विद्यालय प्रागण में इनवाइट किया है। प्रचार-प्रसार हेतु पेम्पलेट भी छपवाए गए है, जिसमें आस पड़ोस के सभी ग्रामीणों को कार्यक्रम में शरीक होने हेतु आग्रह किया गया है। आसपास के सभी ग्रामीण बाईसा को देखने व उनके उद्बोधन को सुनने हेतु आतूर हो उठते हैं।
अगले दिन कार्यक्रम में आसपास के करीबन तीस गाँवों से छात्र वर्ग, युवा व बुजुर्ग पधारते है। विद्यालय प्रागण आसपास से पधारे जनमानस से खचाखच भर जाता है। मंचासीन अतिथि भी बिना किसी विलम्ब, अपने-२ स्थान पर विराजित हो जाते है। बारहवीं के छात्र आज मंच के साइड में, कुर्सियों पर प्रसन्न मुद्रा में दिख रहे होते हैं। किन्तु बाईसा अभी तक नहीं पधारे है, जिनका सबको बेसब्री से इंतजार है।
थोड़ी ही देर बाद बाईसा गाड़ी से उतरते है। तथा सीधी-खड़ी नजरों के साथ मंच की ओर अग्रसर होते है। मंच पर पहुँचने तक, तालियों की गड़गड़ाहट से पाण्डाळ गुंजायमान हो जाता हैं। प्रधानाचार्य व मंचासीन आतिथ्य बाईसा का स्वागत करते हैं। तथा विधिवत रूप से कार्यक्रम की शुरुआत करते हैं। मंचासीन अतिथियों के उद्बोधन के पश्चात, बाईसा को उद्बोधन हेतु आग्रह किया जाता है। बाईसा बेबाक होकर, अपने पर्स में से रेबन का चश्मा निकालते हुए, आँखों पर लगा लेती हैं। बुजुर्ग मेहमान यह देखकर आपस में फुसफुसाहट शुरू कर देते है। युवा वर्ग मुस्कुराते गोरे रंग पर काले चश्में के सौंदर्य को निहारने में व्यस्त हो जाते हैं। छोटे बच्चे आज डर के कारण सून होकर चुपचाप उद्बोधन सुनते रहते हैं।
बाईसा के इस अतरंगी अंदाज से, प्रेरणादायक उद्बोधन की समाप्ति पर तालियों की गड़गड़ाहट से विद्यालय की दीवारें पुनः सर्जित हो उठती हैं।
अगले दिन अखबार में बाईसा की चश्में संग छपी फ़ोटो चर्चा का केंद्र बन जाती है। सब अपनी-२ विचारधाराओं को जीवित रूप देने लग जाते हैं। कल के अतरंगी अंदाज में उद्बोधन के पश्चात, आज के अखबार की मुख्य सुर्खियों में बाईसा की चर्चा, महिला वर्ग में आग की तरह फैल जाती है। आसपास से जान पहचान व अनजान, सभी बाईसा से मिलने को लड़ी लगाए आतूर हो जाते हैं। कुछ दिनों तक आस पड़ोस व रिश्तेदार यूँही घर आकर, बधाइयों की टोकरी भरते रहते हैं। अब बाईसा आसपास की कई लड़कियों की प्रेरणास्रोत भी बन चुकी है। कई माता पिता स्वतः ही बलिका-शिक्षा को लेकर अपना नजरिया भी बदल चुके है।
करीबन दो महीनें बधाइयां पाने के बाद, बाईसा दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में आगे की पढ़ाई हेतु आवेदन करती है। और कुछ ही दिनों बाद यूनिवर्सिटी की दूसरी लिस्ट में बाईसा का नम्बर भी आ जाता है। बाईसा खुशी-२ आगे की पढ़ाई हेतु, वहाँ शिफ्ट होने की तैयारियों में जुट जाती है।
लेकिन बाईसा जिस समाज से है, वह बाईसा के इस डिसीजन से काफी परेशान हो जाता है। बाईसा का समाज, आज भी बारहवीं के बाद की बालिका-शिक्षा को अपराध मानता है। तथा इस उम्र तक बच्ची की शादी कर देने का पक्षधर है। अधिकतर बुजुर्ग व युवा पीढ़ी बाईसा के अकेले दिल्ली शहर में रहकर, पढ़ाई करने को लेकर आपत्ति जताते हैं। कल तक बधाइयाँ बाँटने वाले समाज-सेवक, आज मिलकर बाईसा के पिताजी से उन्हें आगे की पढ़ाई करवाने हेतु मना करते हैं। आज-पड़ोस से लेकर नजदीकी गांवों तक, बाईसा के दिल्ली प्रवास को लेकर कानाफूसी भी शुरू हो जाती है। कुछ इसे बाईसा की नासमझ, तो कुछ दिल्ली की हवा पर दोष मांडने लग जाते हैं। किंतु बाईसा समाज व अन्य के दोषारोपण को इग्नोर करते हुए, सबके सामने चौराहे पर रेबन का चश्मा लगाते हुए, दिल्ली के लिए बस द्वारा कूच कर लेती हैं।
बाईसा के इस जिद्दी रवैये को सब अपने-ऊपर अपमान की तरह लेते हैं। तथा उन पर व उनके माता-पिता पर दोषपूर्ण ऊंगलियाँ उठाना शुरू कर देते हैं।
जब बाईसा के दिल्ली गमन की बात का पता पुराने रिश्तेदारों को लगता है, तो उनके सगे सम्बन्धी तक उनसे मुँह मोड़ लेते हैं। उनके परिवार को बुरा-भला कहने लगते हैं। और धीरे-धीरे घर आना-जाना भी बंद कर देते हैं। समाज में कानाफूसी के चलते नजदीकी व पुराने रिश्तेदार, रिश्तेदारी करने से भी मुकर जाते हैं। जिस कारण बाईसा के लिए समाज से दूरदराज के रिश्ते भी आने लग गए हैं। जहाँ उनके पिताजी रिश्तेदारी नहीं करना चाहते थे, किंतु समाज के पुराने रिश्तेदारों को इस प्रकार मुँह मोड़ते देख, वे अपनी बेटी की सगाई, नए आए रिश्तों में से एक के साथ फिक्स कर देते हैं। जो कि एक पढ़ा लिखा परिवार होता है, तथा उनका बेटा भी, दिल्ली के एक नामी कॉलेज से ग्रेजुएट भी होता है।
बाईसा अब अधिकतर दिल्ली में ही रहने लगे थे। कभी-कभार ही गाँव आया करते थे। लेकिन जब भी गांव आते, पुनः चर्चा का केंद्र बन जाते थे। ग्रामीण परिवेश के छोटे से मार्केट में अकेले, जीन्स पहनकर, चश्मा लगाते हुए कुछ खरीददारी करने पर, पूरे समाज को आफ़त आ जाती थी। वैसे इस बात पर बाईसा से तर्क-वितर्क करने से हर कोई मुँह मोड़ लेता था। और सब उनके पिताजी को समझाने चले जाते थे। उनके बेबाक़ ढ़ंग से बिना डरे हर किसी को सटीक जवाब देने के कारण, हर छोटा-बड़ा उनसे नाराज होने लगा था। लोगों की उनके परिवार के प्रति बढ़ती नाराजगी को देखते हुए, बाईसा ने अपने आप को एक कमरे व लेपटॉप तक सीमित कर दिया। तथा कुछ समय पश्चात से गांव आना भी बंद कर दिया।

बाईसा के गांव न आने पर, बातें ओर बढ़ जाती है। लोग इस बात को लेकर उनके पिताजी को बार-२ ताने मारने लग जाते है। दोषारोपण को ओढ़ता हुआ समय-रथ धीरे-२ आगे बढ़ता है, और बाईसा की ग्रेजुएशन पूरी हो जाती है। जैसे ही ग्रेजुएशन पूरी होती है, पिताजी बाईसा की शादी फिक्स कर देते है। लेकिन बाईसा इस बात से नाखुश है। वह अपने पी.एच डी. के सपने को अकेले, साकार जीना चाहती है। किन्तु समाज के खुलते मुंह को बंद करने के लिए बाईसा, पिताजी की हामी में हाँ भर देती है।
अपनी शादी में पिताजी की ताउम्र कमाई से खरीदे दहेज को देने से बाईसा पूरजोर विरोध भी करती है, किन्तु यहाँ समाज की कुरुतियाँ पढ़ाई पर हावी हो जाती है। और बाईसा न चाहते हुए भी दहेज के साथ, बिना किसी दिल्ली के दोस्त को बुलाए, उखड़े मन से शादी कर लेती है।
शादी के पश्चात बारात हर्षोल्लास के साथ घर लौटती है। नई दुल्हन का स्वागत सत्कार किया जाता है। सारी रीति-रश्में निभाई जाती है। जिनका बाईसा को कुछ भी पता नहीं होता है। इस बात पर बाईसा की जोरदार खिल्ली भी उड़ाई जाती हैं। पूरा ससुराल दिल्ली से पढ़ी-लिखी दुल्हन को देखने घर आता है। बाईसा को उनकी बचपन की सहेलियों ने समझाया था, कि ससुराल में जितना लंबा घुँघट खींचोगी, उतनी ही ज्यादा इज्जत पाओगी। इसलिए रश्मों पर खिल्ली उड़ने के पश्चात, बाईसा ने मुख पर लम्बा सा घुँघट खींच लिया है। धीरे-२, पूरे गाँव से ग्रामीण औरतें, दुल्हन के सौंदर्य का बखान करती हुई, बधाइयाँ बांटकर पुनः अपने-२ लौटती जाती हैं। इस बीच कई बार बाईसा घुँघट खींचना भूल जाती थी, तो उनकी नणद व भुआजी नाराजगी जताते हुए बाईसा को अकेले में समझाते थे। अभी शादी को चौबीस घण्टे भी नहीं हुए थे, कि बाईसा द्वारा दोहराई गलतियों की टोकरी, शाम के समय गिनवाई भी जाने लगती है। किन्तु बाईसा ससुराल पक्ष की इन बातों को इग्नोर करते हुए, ईधर-उधर अपने पति को झाँक रही होती है। क्योंकि उन्हें विश्वास है, कि कोई पढ़ा लिखा, मेरे जैसा ही मुझे समझ पाएगा। कि मैं यह सब ओर अधिक नहीं कर पाऊँगी। किन्तु बन्ना तो आज सुबह ही अपने कॉलेज दोस्त की शादी में शरीक होने हेतु घर से निकल चुके थे।

कुछ ही देर पश्चात पड़ोस से पता चलता है, कि बन्ना की वापस घर लौटते समय, एक्सीडेंट में ऑन स्पॉट मृत्यु हो जाती है। हर्षोल्लास में मुग्ध पूरा गाँव शौक में डूब जाता हैं। चारों ओर से केवल रोने व चीखने की ही आवाजें सुनाई पड़ती हैं। बाईसा के हाथों की अभी मेहन्दी भी नहीं सूखी थी, और वह मात्र चौबीस घंटे के भीतर विधवा हो जाती है। बाईसा के सारे गहने, हाथ की चूड़ियां, माथे का सिन्दूर हमेशा के लिए पोंछ दिया जाता हैं। और ताउम्र के लिए सफेद रङ्ग ओढ़ा दिया जाता हैं। जिसे वह चाहकर भी रंगीन नहीं कर पाएगी। यह बात वह बचपन से ही, अच्छी तरह समझती है।
पढ़े-लिखे नए रिश्तेदार बाईसा पर तानों की झड़ी लगा देते हैं। उन्हें घर, परिवार व समाज पर कलंक बताते हैं। दाह-संस्कार के दो दिन बाद से ही घर-परिवार व आस-पड़ोस के सदस्य, उन्हें आते-जाते खरी-बुरी बातें सुनाने लग पड़ते हैं। शोकागुल परिवार सारी आफ़तों का दोष, केवल बाईसा के माथे धर देता हैं। किन्तु बाईसा किसी को कोई जवाब नहीं देती हैं। उनकी सारी शिक्षा घर, परिवार व समाज के झूठे दोषारोपण व प्रतिबंधित नियमों के आगे विफल हो जाती है। वह एक कोने में अपने आप को समेटकर, खिड़की से चाँद-तारों को ताकती हुई किसी अन्य दुनियाँ के ख्यालों में भूखी-प्यासी खो जाती हैं।
शादी के सातवें दिन, बाईसा दहेज में आए हुए नए रेबन के चश्मे को पहनते हुए, स्वयं को बन्द कमरे में फाँसी लगा लेती हैं। पूरे समाज की सोच पर शोक छा जाता है।