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Saturday, May 4, 2019

आखातीज या आखात्री पर्व

आखातीज, जिसे रेगिस्थान का अपना त्योहार माना जाता हैं। इस रेगिस्थानी पर्व की शुरुआत अक्षय तृतीया से लगभग पन्द्रह-बीस दिन पूर्व ही हो जाती हैं। बच्चों की मण्डली प्रातः जल्दी उठकर, बैलों के गले में बाँधी जाने वाली घण्टियों को लेकर, जोर-जोर से बजाती हुई सभी को सचेत करती हैं। और फिर वे सभी लकड़ी के बनाए हुए छोटे-छोटे हळो से रात भर सूखे धोरों पर, एक खेत की तरह हळ जोतते रहते हैं। और अपनी हरियल भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सभी बच्चे हल जोतते समय एक साथ, एक लय-ताल में गीत गाते रहते हैं-
आकड़े रो हळियो, नीम्बड़े री नाइ।
रमते-झुमते, बाजरकी ब़ाइ....।।
हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते रहते और बातें करते रहते। बच्चों की यह रोजमर्रा प्रक्रिया आखातीज तक सतत चलती रहती हैं।
आखातीज का त्योहार मुख्यतः तीन दिन चलता है। प्रथम दिन आँगन के चौक में बनी रंगोली पर अनाज के पांच छोटे-छोटे ढेर बनाए जाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रखी जाती हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखा जाता हैं। बच्चे सुबह जल्दी स्नान करके, रूमाल में गुड़ व आखा लेकर, गले में बैलों की घण्टियाँ लटकाकर, हळ जोतने धोरे पर इकट्ठा हो जाते हैं। वे हंसते-खेलते एक-दूसरे को गुड़ की मनुहारे करते हैं। तथा आने-जाने वाले ग्रामीणों को पौटली में से आखा देकर, उनका स्वागत सत्कार गुड़ खिलाकर करते हैं। और ग्रामीण भी बच्चों को सकारात्मक रवैये से इस बार अच्छी बारिश होने के सगुन बताकर उन्हें खुश करते हैं।
ग्रामीण अपनी-अपनी कोटड़ी के आँगन में अनाज के पांच छोटे-छोटे ढ़ेर बनाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रख देते हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखते हैं। और फिर सभी जनसामान्य कोटड़ी में चल रही रियाण में इकट्ठा होकर, एक-दूसरे को पर्व की बधाइयाँ देते हैं। इस दिन आगामी मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता हैं। तथा इस वर्ष सुकाळ रहेगा या अकाळ?, इसके सगुन एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। रियाण में अफीम गलाकर एक-दूसरे को मुट्ठी-भर पिलाने की मनुहारे करते हैं। इस दिन सभी विरोधी गिले-शिकवे व बेर भूलकर एक ही जाजम पर बैठते हैं। कोटड़ी में चल रही रियाण के लिए सभी घरों से खीच भरी थालियाँ व अन्य व्यंजन आते हैं। जिसे यहाँ की भाषा में तासळा कहते हैं। और फिर सभी बाजरे के खीच के साथ घी-गुड़, दही या कढ़ी लेकर एक-साथ बैठ भोजन करते हैं। फिर वे सभी एक साथ दूसरी कोटड़ी पधारते हैं, उनकी मनुहार, सगुन-परख व भोज-सत्कार मिळझुलकर साझा करते हैं। मांगणियार इस शुभ अवसर पर मनुहार व हर्षोल्लास के सुरीले गीत गाते हैं। कुछ समय पश्चात बच्चों की मण्डली जोर जोर से घण्टियाँ बजाती हुई, गांव की सभी कोटड़ियों में पधारती हैं, सभी हंसी-खुशी उनका स्वागत करते हैं, उन्हें बाजरे के खीच संग घी-गुड़, दही व कढ़ी भरपेट खिलाते हैं। इस दिन मुख्यतः सभी घरों में बाजरे का खीच ही बनाया जाता हैं। खीच बनाने के लिए एक दिन पूर्व, भीगे बाजरे को घर के आंगन में धंसी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता हैं। फिर इस कूटे हुए बाजरे को सुखा दिया जाता हैं। और अगले दिन पकाया जाता हैं।
पर्व का दूसरा दिन यानी दूज, भी हू-बहू प्रथम दिन(अमावस्या) की तरह ही मनाया जाता है।
पर्व का तीसरा व आखरी दिन अक्षय तृतीया, भी हू-बहू दोनों दिनों की तरह ही मनाया जाता हैं, किन्तु इस दिन मेहमानों को भोजन में बाजरे के खीच के स्थान पर गुळराब, घी-गुड़ में तैरते गेंहू के फाफरिये, कैर-सांगरी व ग्वारफळी की सब्जी के साथ-साथ दही-छाछ परोसी जाती हैं।
आज चीज़े बदलने लग गयी हैं। बुजूर्ग आधुनिक आखातीज के परिपेक्ष में व्यथा सुनाते हैं, कि "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच व घी से भरी रहती थी, किन्तु आज थालियाँ छोटी हो गयी हैं और खीच उससे भी कम"। पहले पूरी रात हल जोते जाते थे। रात भर बळधिया बनकर जोर-जोर से घण्टियाँ बजाते थे। किंतु आज के बच्चे अब अक्षय तृतीया को ही दिखते हैं। बड़ी वाली घण्टियाँ तो इन्होंने देखी ही नहीं हैं। आज आखातीज का यह त्योहार धीरे-धीरे सिकुड़ रहा हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore

Saturday, April 6, 2019

होळी : एक थार पर्व

पिछले महीने होली का पर्व था। सुबह हल्की फुल्की लू के साथ होली के पर्व की शुरुआत हुई। होली का पर्व- लू के शुरुआती दिन होते हैं। लोग सुबह से ही एक दूसरे को बधाइयां देने में व्यस्थ हो गये। वे एक दूसरे के साथ मिलकर किसी तीसरे के वहाँ जाते और फिर वे सब मिलकर किसी चौथे के वहाँ जाते। वहाँ जाकर बीड़ी,सिगरेट,अफीम की मनुहार के साथ मीठा भोजन करते। फिर गांव की अपनी बातों में व्यस्थ हो जाते हैं।
शाम के समय बींजा भील आकर लकड़ियों की होली बना देता हैं। सूर्यास्त होने तक तो, सभी युवा खेल के मैदान में ही दिखते हैं। फिर भोजन करके बुजुर्ग और नोजवान युवा, होलिका दहन स्थान की ओर चल देते हैं। फिर सब मिलकर होली के गीत(फ़ाग) गाने लग जाते हैं, "हाय रे होली आयी रे, फागण री मस्ती.."। तब तक बच्चे घर-घर जाकर, "चांचेले बजाकर 'आडो-पाडो' की उखड़ती आवाजों को दुहराते हुए" गुड़, कुळीयाँ*, खींचिये, कोपरे व फूलियाँ* एक बड़ी सी झोली में लेकर आते हैं। साथ में लाते हैं- दो लौटे घी और खूब सारे चांचेले। फिर झोळी में से खाने लायक चीजें सब में बांट दी जाती हैं। और आक की लकड़ी के बने चांचेले, होली के अंदर डाल दिये जाते हैं। बाद में शुभ मुहूर्त पर ग्राम-मुखिया सवाई सिंह होलिका दहन करते हैं। भागता हुआ रविन्द्र जलती आग की लपटों में से प्रह्लाद को खींचकर बाहर निकाल देता हैं। और उसे लेकर होली के चारों ओर, चार चक्कर लगाने लगता हैं, और सब उसके पीछे-पीछे चक्कर लगाते हुए, आग की उठती लपटों को निहारने लगते हैं।
फ़ोटो : होलिका दहन
लोगों में मान्यता है कि होलिका दहन के समय आग की लपटों से निकलने वाले पतंग अगर ध्रुव तारे की विपरीत दिशा में उड़ते हैं, तो इस वर्ष अच्छी बारिश होगी। इस बार अच्छी बारिश होने के संकेत मिले, तो सभी खुश हो गये।
दूसरी मान्यता यह भी है, कि अगर दूसरे गांव का कोई व्यक्ति होली के जलते अँगारे लेकर चला गया, तो इस गांव की बजाय उस गांव में अच्छी बारिश होगी। लोग आस्थाओं और मान्यताओं को सर्वेसर्वा मानते हैं। फिर शुरू हो गयी- पाळा-कब्बडी, जिसमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने भाग लिया। रात को करीबन दो बजे सब हँसी-खुशी घर लौट गये।
अगली सुबह ग्रामीण ओरतें होलिका दहन स्थान पर पूजन कर, खुशहाली की कामना करती हैं। फिर शुरू हो गयी लट्ठमार होली। ओरतें रँग डालने वालों को लट्ठों से कूटने पर उतर आती हैं। होली की यह ग़ैर पूरे दिन तक चली। बिना होळी का रंग लगे कोई न बच पाया।
शाम को जब लू थोड़ी कम पड़ी,तो रेत के टीले पर कुश्ती का आयोजन किया गया। बच्चों ने बढ़ चढ़कर दिलचस्पी दिखाई। फिर दिन ढ़लते ही सब, हारे-थके अपने-२ घर की ओर निकल गये।
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#लट्ठमार होली का मतलब : गांव की औरतें रंग डालने वालों को लट्ठ, गाय के नैयजण(बकरी की ऊन से बनी रस्सी) तथा सौटे(पुराणी ओढ़नी को गूंथकर बनाई रस्सी) से पीटने के लिए पीछे भागती हैं।
#कुलियाँ : तवे पर नमक, मिर्च के साथ सेके गए मतीरे के बीज।
#फूलियाँ : पॉपकॉर्न।
(Photo : Mool Singh Rathore)
(Photo : Mool Singh Rathore)
(Photo : Mool Singh Rathore)