पिछले महीने होली का पर्व था। सुबह हल्की फुल्की लू के साथ होली के पर्व की शुरुआत हुई। होली का पर्व- लू के शुरुआती दिन होते हैं। लोग सुबह से ही एक दूसरे को बधाइयां देने में व्यस्थ हो गये। वे एक दूसरे के साथ मिलकर किसी तीसरे के वहाँ जाते और फिर वे सब मिलकर किसी चौथे के वहाँ जाते। वहाँ जाकर बीड़ी,सिगरेट,अफीम की मनुहार के साथ मीठा भोजन करते। फिर गांव की अपनी बातों में व्यस्थ हो जाते हैं।
शाम के समय बींजा भील आकर लकड़ियों की होली बना देता हैं। सूर्यास्त होने तक तो, सभी युवा खेल के मैदान में ही दिखते हैं। फिर भोजन करके बुजुर्ग और नोजवान युवा, होलिका दहन स्थान की ओर चल देते हैं। फिर सब मिलकर होली के गीत(फ़ाग) गाने लग जाते हैं, "हाय रे होली आयी रे, फागण री मस्ती.."। तब तक बच्चे घर-घर जाकर, "चांचेले बजाकर 'आडो-पाडो' की उखड़ती आवाजों को दुहराते हुए" गुड़, कुळीयाँ*, खींचिये, कोपरे व फूलियाँ* एक बड़ी सी झोली में लेकर आते हैं। साथ में लाते हैं- दो लौटे घी और खूब सारे चांचेले। फिर झोळी में से खाने लायक चीजें सब में बांट दी जाती हैं। और आक की लकड़ी के बने चांचेले, होली के अंदर डाल दिये जाते हैं। बाद में शुभ मुहूर्त पर ग्राम-मुखिया सवाई सिंह होलिका दहन करते हैं। भागता हुआ रविन्द्र जलती आग की लपटों में से प्रह्लाद को खींचकर बाहर निकाल देता हैं। और उसे लेकर होली के चारों ओर, चार चक्कर लगाने लगता हैं, और सब उसके पीछे-पीछे चक्कर लगाते हुए, आग की उठती लपटों को निहारने लगते हैं।
लोगों में मान्यता है कि होलिका दहन के समय आग की लपटों से निकलने वाले पतंग अगर ध्रुव तारे की विपरीत दिशा में उड़ते हैं, तो इस वर्ष अच्छी बारिश होगी। इस बार अच्छी बारिश होने के संकेत मिले, तो सभी खुश हो गये।
दूसरी मान्यता यह भी है, कि अगर दूसरे गांव का कोई व्यक्ति होली के जलते अँगारे लेकर चला गया, तो इस गांव की बजाय उस गांव में अच्छी बारिश होगी। लोग आस्थाओं और मान्यताओं को सर्वेसर्वा मानते हैं। फिर शुरू हो गयी- पाळा-कब्बडी, जिसमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने भाग लिया। रात को करीबन दो बजे सब हँसी-खुशी घर लौट गये।
अगली सुबह ग्रामीण ओरतें होलिका दहन स्थान पर पूजन कर, खुशहाली की कामना करती हैं। फिर शुरू हो गयी लट्ठमार होली। ओरतें रँग डालने वालों को लट्ठों से कूटने पर उतर आती हैं। होली की यह ग़ैर पूरे दिन तक चली। बिना होळी का रंग लगे कोई न बच पाया।
शाम को जब लू थोड़ी कम पड़ी,तो रेत के टीले पर कुश्ती का आयोजन किया गया। बच्चों ने बढ़ चढ़कर दिलचस्पी दिखाई। फिर दिन ढ़लते ही सब, हारे-थके अपने-२ घर की ओर निकल गये।
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#लट्ठमार होली का मतलब : गांव की औरतें रंग डालने वालों को लट्ठ, गाय के नैयजण(बकरी की ऊन से बनी रस्सी) तथा सौटे(पुराणी ओढ़नी को गूंथकर बनाई रस्सी) से पीटने के लिए पीछे भागती हैं।
#कुलियाँ : तवे पर नमक, मिर्च के साथ सेके गए मतीरे के बीज।
#फूलियाँ : पॉपकॉर्न।
शाम के समय बींजा भील आकर लकड़ियों की होली बना देता हैं। सूर्यास्त होने तक तो, सभी युवा खेल के मैदान में ही दिखते हैं। फिर भोजन करके बुजुर्ग और नोजवान युवा, होलिका दहन स्थान की ओर चल देते हैं। फिर सब मिलकर होली के गीत(फ़ाग) गाने लग जाते हैं, "हाय रे होली आयी रे, फागण री मस्ती.."। तब तक बच्चे घर-घर जाकर, "चांचेले बजाकर 'आडो-पाडो' की उखड़ती आवाजों को दुहराते हुए" गुड़, कुळीयाँ*, खींचिये, कोपरे व फूलियाँ* एक बड़ी सी झोली में लेकर आते हैं। साथ में लाते हैं- दो लौटे घी और खूब सारे चांचेले। फिर झोळी में से खाने लायक चीजें सब में बांट दी जाती हैं। और आक की लकड़ी के बने चांचेले, होली के अंदर डाल दिये जाते हैं। बाद में शुभ मुहूर्त पर ग्राम-मुखिया सवाई सिंह होलिका दहन करते हैं। भागता हुआ रविन्द्र जलती आग की लपटों में से प्रह्लाद को खींचकर बाहर निकाल देता हैं। और उसे लेकर होली के चारों ओर, चार चक्कर लगाने लगता हैं, और सब उसके पीछे-पीछे चक्कर लगाते हुए, आग की उठती लपटों को निहारने लगते हैं।
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| फ़ोटो : होलिका दहन |
दूसरी मान्यता यह भी है, कि अगर दूसरे गांव का कोई व्यक्ति होली के जलते अँगारे लेकर चला गया, तो इस गांव की बजाय उस गांव में अच्छी बारिश होगी। लोग आस्थाओं और मान्यताओं को सर्वेसर्वा मानते हैं। फिर शुरू हो गयी- पाळा-कब्बडी, जिसमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने भाग लिया। रात को करीबन दो बजे सब हँसी-खुशी घर लौट गये।
अगली सुबह ग्रामीण ओरतें होलिका दहन स्थान पर पूजन कर, खुशहाली की कामना करती हैं। फिर शुरू हो गयी लट्ठमार होली। ओरतें रँग डालने वालों को लट्ठों से कूटने पर उतर आती हैं। होली की यह ग़ैर पूरे दिन तक चली। बिना होळी का रंग लगे कोई न बच पाया।
शाम को जब लू थोड़ी कम पड़ी,तो रेत के टीले पर कुश्ती का आयोजन किया गया। बच्चों ने बढ़ चढ़कर दिलचस्पी दिखाई। फिर दिन ढ़लते ही सब, हारे-थके अपने-२ घर की ओर निकल गये।
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#लट्ठमार होली का मतलब : गांव की औरतें रंग डालने वालों को लट्ठ, गाय के नैयजण(बकरी की ऊन से बनी रस्सी) तथा सौटे(पुराणी ओढ़नी को गूंथकर बनाई रस्सी) से पीटने के लिए पीछे भागती हैं।
#कुलियाँ : तवे पर नमक, मिर्च के साथ सेके गए मतीरे के बीज।
#फूलियाँ : पॉपकॉर्न।
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| (Photo : Mool Singh Rathore) |
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| (Photo : Mool Singh Rathore) |
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| (Photo : Mool Singh Rathore) |




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