Tuesday, April 30, 2019

क्या तुमने देखा है?

कल का रेगिस्थान आज के वर्तमान से पूछता है, कि क्या तुमने देखा है?- प्रभातकाल में घरटी पीसती माँ की बाहों में ऊँघते बच्चे की खुशी, गोधूलि वैला में खुरों से खनकती खड़तालें, बकरियों की शोरगुल राग को काटती घेटियों की ममता, ढ़लती रात संग कुतों का अलसाना, जुगाली करती बेफिक्र साँसे, मोर मुकूट के मधूर गीत, ढ़लते सूरज को देख चिड़ियों का चहचहाना, पीलू चुगती दोपहर की लू, मिट्टी के बर्तन में मीठे होते कैर, भरी दोपहर में नासका सूँघती औरतें, सांगरी झाड़ते वक्त बच्चे की आंखों में खटकती भेड़-बकरियां, भेड़ो की ओर भागते घेटिये, ढ़लती साँझ के समय लकड़ियों से लदे जन्तरे लाते खर, प्रभात में घरटियों की बुलंद होती आवाजें, बिलोने में मक्खन को ताकती बिल्ली की नज़रें, गाय को नैयजण लगाती माँ को देखता बछड़ा, बाजरे की रोटी पर मक्खन लगाकर जांखळ करता गौधणी, दोपहर को कैर के चूंटे चुगकर अलग करती औरतें, सांढ़ के दूध को तपेले में पीते बच्चे की खुशी, गोधूलि वैला में गूंजती घण्टियों की आवाजें, चांदनी बरसाती ठण्डी रेतीली रातें, झर्र-मर्र करते झेरणे को ताकता कौआ, गेंहू के दलिये से बनी गाठ का झारा करता रेगिस्थान, दोपहर में ऊँठो की दौड़ लगाते सवार, खेजड़ी के सूखे खोखे चुगती औरतें, आक के पत्तो पर चाय पीता बणजारा, चलती कुदालों संग गूँजते हमरचे के गीत, मिट्टी के बर्तन में छाछ गटकते घेटिये, खोखली चारपाई में गुनगुनाते भँवरे, गूंगे के पैरों में धागा बांध उसकी उड़ान का पीछा करते बच्चे, ब्यालू करते समय कुत्ते की नज़रें, बैरी से बरत खींचते नंगे पैर, ऊँठो का अपार प्रेम-प्रसंग, दोपहर को झुलसती लू में कंधे पर लटकती पानी की दीड़ी, उड़ती स्वर्ण रेत के बवंडर, दोपहर को पानी से भरी पख़ाल ढ़ोता ऊँठ, मांगणियारों की खड़ताल संग खनकती ढोलकी का लयमयी तालमेल, तंदूरे संग कांसियों का संगम, आस्था की प्रसाद पर नज़रे जमाये कौए की एकटुकता, अडिग रीति रिवाज पर खरी उतरती साँसे, दानी पुरुष की आँखे, त्यौहारों पर सजती रियाणे, अपनत्व भाव से हाथ फैलाती मनुहारें, भाणी पर घिसते बरत के आकस्मिक टूटने से गूँजी आवाजें, ऊँठो की होड़ से उठता रेत-बवंडर, घोड़ों के एक साथ हिनहिनाने की खुशी, अरटिये से सूत कातती औरतों की एकरूपता, टूटी बरत को पकड़ते जुझारू आदमी का फड़कता दिल, दोपहर को कपड़ा टाँकी पानी की बोतल को सिराणे लगाकर ऊँघता मदमस्त ग्वाला, चीनी की प्लेट से चाय की चुस्की लेते वक्त धूजते झुर्रीदार हाथ, कठान्तरे में रखे मक्खन को निहारती बिल्ली की नजरें, भेड़ो पर चलते कातीये, रलियाँ सीलती औरतों की मण्डली, निम्बोळी के झांरे को लेकर भागता बचपन, रात्रिकालीन जागरण में बजते तन्दूरे की राग, दीपावळी को मतीरे अन्दर जलता दीया, रोते बच्चे के माथे से जूएँ निकालते झुर्रीदार हाथ,मनुहार के सुरीले गीत, मोर पंख को ढूंढ़ते बच्चों की आतुरता।
(Photo : Mool Singh Rathore)

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