रेगिस्थान में आस्थाएं सिर चढ़ कर बोलती हैं। लोग आस्थाओं को सर्वेसर्वा मानते हैं। हर दुःख का निवारण आस्थाओं में ढूंढ़ते हैं। यहाँ तक कि, बुखार का भी सॉल्यूशन आस्थाओं में ढूँढा जाता हैं। सिर पर सात बार आखा घुमाते हुए झुर्रीदार हाथ, पांच रुपये का सिक्का अपने पल्ले बांध देते हैं। और कौन सी परलौकिक शक्ति आपसे नाराज है, यह अगले ही दिन भोपियाँ तय कर देती हैं। और आस्था के नाम पर नासका सूंघने लगती हैं।
भोपियों की कही हुई बात को टालना भी एक अपराध माना जाता हैं। इनकी एक अद्भुत खासियत है, कि ये बिना किसी ईश्वरीय दोष के किसी को भी वापस नहीं लौटाती हैं। इनके पास सबकी सूची है- देवी-देवता से लेकर, दरगाह में सोए अकबर तक की।
इन्ही की आड़ में देर रात को पाळीये पर उठता है- बिड़ियों का धुँआ, हथेलियों पर खुलती है अफीम की थिगड़ियाँ, स्टील की बट्टी में घुलती है साँसों की बन्द थैलियाँ, और चिलम की साफ़ी संग मृत्यु से आंखमिचौली खेलता हुक्के का धुँआ। और सब दोष धर दिया जाता है भक्ति की शक्ति पर। सुबह होने से पहले कड़ाइये में भूंजे जाते है तैलीय चाटुवे। और चूल्हे में जल रहा होता है गरीब का परिवार।
सब कुछ यहीं पर खत्म नहीं होता है। भोपियाँ फिर मांगती हैं, आने वाले अगले महीने की चान्दनी चौदस को डेढ़ सौ किलोमीटर दूर बकरे की बलि। सिर पर कर्ज की पौटली रखे, वह मजबूरन एक झटके में उठता सिर उड़ाता है। यहाँ भी डर है उसको, कि कईं आस्थाएं खण्डित न हो जाएं।
कुछ दिनों बाद फिर 'घुटी' आयी चान्दनी बारस को। भोपियाँ बिजी थी तैरस को। इसलिए चौदस को मुसाफ़िर पहुंचा भोपी के द्वार। उसने बताई आप-बीती कहानी। भोपी ने देखे आखे और बताया कल आने वाली चान्दनी पूनम का दोष। पुनः जुट गया कर्जी गरीब मजदूर, दूसरी बलि की तैयारियों में। और फिर ता-उम्र इसी में गुजार गई। किन्तु आस्थाएँ आज भी उससे नाराज है। आज वह फिर किसी ठेकेदार के यहाँ गया था। उसको फिर आस्थाओं का दोषी ठहरा दिया गया हैं।
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#आखा : मुट्ठी में बंद गेंहू के 10-12 दानें।
#घुटी : एक मानसिक बीमारी।
#चाटुवा : किसी खाद्य वस्तु को भूंजने या सेकने हेतु प्रयुक्त लकड़ी का बना हुआ डण्डा।
#थिगड़ियाँ : पौटलियाँ।
भोपियों की कही हुई बात को टालना भी एक अपराध माना जाता हैं। इनकी एक अद्भुत खासियत है, कि ये बिना किसी ईश्वरीय दोष के किसी को भी वापस नहीं लौटाती हैं। इनके पास सबकी सूची है- देवी-देवता से लेकर, दरगाह में सोए अकबर तक की।
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| फ़ोटो : प्रेमाजी |
सब कुछ यहीं पर खत्म नहीं होता है। भोपियाँ फिर मांगती हैं, आने वाले अगले महीने की चान्दनी चौदस को डेढ़ सौ किलोमीटर दूर बकरे की बलि। सिर पर कर्ज की पौटली रखे, वह मजबूरन एक झटके में उठता सिर उड़ाता है। यहाँ भी डर है उसको, कि कईं आस्थाएं खण्डित न हो जाएं।
कुछ दिनों बाद फिर 'घुटी' आयी चान्दनी बारस को। भोपियाँ बिजी थी तैरस को। इसलिए चौदस को मुसाफ़िर पहुंचा भोपी के द्वार। उसने बताई आप-बीती कहानी। भोपी ने देखे आखे और बताया कल आने वाली चान्दनी पूनम का दोष। पुनः जुट गया कर्जी गरीब मजदूर, दूसरी बलि की तैयारियों में। और फिर ता-उम्र इसी में गुजार गई। किन्तु आस्थाएँ आज भी उससे नाराज है। आज वह फिर किसी ठेकेदार के यहाँ गया था। उसको फिर आस्थाओं का दोषी ठहरा दिया गया हैं।
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#आखा : मुट्ठी में बंद गेंहू के 10-12 दानें।
#घुटी : एक मानसिक बीमारी।
#चाटुवा : किसी खाद्य वस्तु को भूंजने या सेकने हेतु प्रयुक्त लकड़ी का बना हुआ डण्डा।
#थिगड़ियाँ : पौटलियाँ।
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| फ़ोटो : पेमोजी |
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| फ़ोटो : पेमोजी |
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| Photo : Mool Singh Rathore |




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