यह जयपुर में मैरे शुरुआती दिन हैं। आज जयपुर आये सात दिन हो गए हैं, किंतु सुबह की किरण और घर लौटती शाम नहीं देखी हैं। जयपुर को ऊंघते हुए तो शायद किसी ने नहीं देखा हैं। सुबह रफ्तार पकड़ती सड़कों से अचानक नींद खुल जाती हैं। यहाँ की अमीरी-अकड़ गाड़ी की रफ्तार से पहचानी जाती हैं। गाड़ियाँ इतनी की रोड़ क्रॉस करने के लिए हरी बत्ती के बुझने की दुआ करनी पड़ती हैं। यह शहर धुँआ-धुँआ हुआ पड़ा है, इतने दिनों में ही आंखे दर्द करने लग गयी है। एयर पॉल्युशन इतना तेजी से बढ़ रहा है, कि जल्द ही यह शहर सबको चुनोती देगा। खबरदार! हम राजस्थान की राजधानी हैं, हमें हर रेस जीतने की आदत है। नजाने कितनी साँसों को कोने में घोटता होगा, यह शहर।
इस बार तो यहाँ की गर्मी, रेगिस्थान से भी ज्यादा अकड़ रही हैं। वैसे भी रूम से बाहर निकलने का मन नहीं करता है, और ऊपर से यह आग उगलती जयपुर की दोपहरें। रोटी बनाने बैठो तो पसीना आँखों से छलकता हैं। शाम को जब कभी हल्की फुल्की हवा बहने भी लगे, तो गूंज उठती है सड़को की रफ्तार और बालों को छू जाती है पोल्युटेड एयर।
यहाँ साँसे कोई नहीं लेता हैं, सब चौराहे पर फेफड़े बेचते फिर रहे हैं। रेगिस्थानी रातें जितनी ठंडी होती हैं, उतनी ही ऊमस उगल देती है, यह जयपुरी सफेद रातें। रूम की खिड़कियाँ खुलना तो चाहती हैं, पर मजबूर कर दी गयी हैं। धधकती आग की लपटें, आज मरू-मानूस के संग होळी की गैर खेल रही हैं। और धुँए संग घुटती साँसे, सिंध के थार से लौटती हवाओं के झोंके को तरस रही है।
इस बार तो यहाँ की गर्मी, रेगिस्थान से भी ज्यादा अकड़ रही हैं। वैसे भी रूम से बाहर निकलने का मन नहीं करता है, और ऊपर से यह आग उगलती जयपुर की दोपहरें। रोटी बनाने बैठो तो पसीना आँखों से छलकता हैं। शाम को जब कभी हल्की फुल्की हवा बहने भी लगे, तो गूंज उठती है सड़को की रफ्तार और बालों को छू जाती है पोल्युटेड एयर।
यहाँ साँसे कोई नहीं लेता हैं, सब चौराहे पर फेफड़े बेचते फिर रहे हैं। रेगिस्थानी रातें जितनी ठंडी होती हैं, उतनी ही ऊमस उगल देती है, यह जयपुरी सफेद रातें। रूम की खिड़कियाँ खुलना तो चाहती हैं, पर मजबूर कर दी गयी हैं। धधकती आग की लपटें, आज मरू-मानूस के संग होळी की गैर खेल रही हैं। और धुँए संग घुटती साँसे, सिंध के थार से लौटती हवाओं के झोंके को तरस रही है।
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| फ़ोटो : जयपुर आर्किटेक्चर |
आज तक मैंने जिस जयपुर को तस्वीरों में देखा था, वह हकीकत को किनारे किया हुआ था। आते समय मैंने रिक्शा में से हवामहल के धुंधले, कलात्मक चेहरे को निहारते लम्बे-चौड़े व अनूठे बज़ार को देखा था। जयपुर पुराणी कलात्मक कलाकारी का बेजोड़, अनूठा उदाहरण रहा हैं, और उससे भी अधिक यह शहर, गुलाबी रंगों से व्यवस्थित सजाया गया हैं। आते समय नज़रें इन्ही में खोयी रह गयी।
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| फ़ोटो : हवामहल, जयपुर |
किन्तु आज जयपुर की विडम्बना यह है कि वह अपने तन पर धुँए की कालिख़ पौत रहा हैं। और आज के जयपुर की गुलाबी शामें काले अँधेरे के साये में हैं। फ़रिश्ते कहाँ विराजित हैं?



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