वर्तमान रेगिस्थान के परिपेक्ष में, नब्बे वर्षीय वृद्ध अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए, अपने संग बुढ़े हुए रेगिस्थान की आज से तुलना कर कहते हैं, कि-
ओ बख़त बह गया,
बातां गयी बिसर।
कदेक अवळू आवसी,
जो बैठा चितर।।
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| फ़ोटो : चितरिंग बा |
दिन गया दीसता, रूपाळी गई रातां।
करता बैठा डोकरा, जुग जूने री बातां।
गया पाणी पीवता, खोफ़ खारो खावता।
हमें वारों आपरो, कह गया जावता-जावता।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०१)
रेता जिथिये रत उथीये, रया जांतरा हाल।
हिणा देखता उथिये, तो घणा बळे आन्तरा।
उठ सामां आवता, सुगन मिळता सांतरा।
हिंयो हुलाती हँसता, उथीये किस्सा भ्रांत-रा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०२)
पेल नैण परखता, पाछे परखता भ़ेण।
कोस भर आता लैण, सामां देखत सैण।
हँसे कोडे धापता, रेता कई-कई रैण।
उगे-आथवें री भाण नहीं, जद बैसता मन री कैण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०३)
बेसण राखता बाजठो, हाथ जोड़ होशियार।
माथे नेह राखता, प्राण कर न्योछार।
भोजन थाळ भरावता, कर-कर डोढ़ी मनुहार।
लाड कोड सूं जिमावता, दे-दे कोळीया चार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०४)
काले पिरा जावजो, रहो आजोड़ी रात।
थे कद पाछा आवसो, करा मन री बात।
ओ दिनड़ा दूर गया, गयी मदरी रात।
संग छूटा सैणा रा, रयी मन री बात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०५)
मन मिळतो मानखो, जिथिये गुण मिळता ज्ञान।
साम्भळता दे-दे ध्यान, कर-कर ऊभा कान।
मोह मिळे नहीं मान, उथिए गयी आन।
आज बातां ऊभरी, छूटा कदरदान।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०६)
आवता देख ऊठता, मिळता गळ-बाँह दे।
उथीये देख ऊँगाणा, अपणापण रो आयो छे।
तेल खुटा दीप का, छूटा नाता-नेह।
बिन बादळ-बिन बिजळी, केड़ा बरसे मेह।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०७)
केना का-कुण सुणे, मन अपणे री बात।
जिको साथी संग रा, छुड़ाय गया हाथ।
मिनख गया मोकळाए, गयी मिनखा री बात।
ऊमर साथे उधारणा, गहरी कर गया घात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०८)
मगरे बेस मोरिया, कळाक करता जोर।
आज उथिये बैठा, गुगू देवे घोर।
अमलां साथे ऊठता, गळता चारे पोर।
ओ ओतारा उठ गया, गासण खा गया ढोर।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०९)
हैमर जिथिये हींसता, रींजता जिथिये राज।
उथिये ऊभा आज खर, भान्ध मोटे भूँके।
कविया-गविया चल गया, राग-रागिणे सूके।
आज उथिये कूतरा, कर मूंह ऊंचा कूके।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१०)
कवियां संग कोयलां, करती जिथिये किलोल।
श्रवण साखरा लागता, हिंयो देतो हिलोल।
छंद गाजता चारणा, भाट चोपड़ा खोल।
कविये छोड़्या बोल, जिथिये जाणे नी कोई मोल।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(११)
झेडर,अरणी,रायचन्द,चिरमी,डोरो चसिया।
मणिधर,मखणो,मोरियो, विरहीजण राग उदासिया।
ओ मैरासी मर गया, जो रहता राज मन बसिया।
कविया-गविया की करे, गया राग पुछाण रसीया।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१२)
नर-नगारा गूँजता, जोगिये मुरली जाण।
ढोल-डांडिये रमता, घोळ कर घमसाण।
चंग हूंगरे चालता, पैरुवे पाबा पिछाण।
बंशी मदरी बाजती, ऊँची थळीये आण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१३)
धड़ उठता भड़कता, आता कोई काज।
दुःख दूजैरा देखता, सुख आपरा साज।
धीरज घण बंधावता, राख हींये राज।
उथिये दीठा आज, लोको छड गया लाज।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१४)
सूखा जिथिये सरवर, उथिये पीयण री आश।
मन के मैड़ी चड़ा, जाऊं सैणा रे पास।
ओ मनख मिट गया, होत गया हतास।
हेत प्रीत के कारणे, भूला फिरे उदास।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१५)
जिके रूंखड़े चकुओ-चकवी, करता रैण निवास।
परबीति पड़्या सुणावता, काढ़ मुख मिठास।
पग पाळा पंथिया, सुख रा लेता स्वांस।
ओ रूंखड़ा रुळ गया, उड़ गया पंछी आकाश।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१६)
गऊवां दुहाड़ती गोरड़ी, होता बिलाणा हमेश।
दूध-दही रा दरिया, बेहता जिथिये विशेष।
लौटो छाछ रो रावळे, उथिये दीठो अवेश।
मुंह उतार मानखो, दर-दर फिरे दरवेश।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१७)
रूड़ो सावण भादरो, मेघ मलार गावतो।
निर्मल नीर अपार, मनख मवेशी पावतो।
गाज घण कर जावतो, झड़ी मेह बरसावतो।
रूड़ो धरणी रूप, जिथिये इन्दर देखण आवतो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१८)
छीलर टोभा छलकता, दे-दे लाँबी उछात।
देख मन मुळकता, हिंयो देतो हुलास।
तालर देख तिड़कता, अँखिये सूखी आश।
उथिये सूखो आज, घण हरियो भात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१९)
हळ भेळो हमरचो, जिथिये नैदाण काढ़ता लासिया।
राणलिये संग खूँटता, जिथिये महीड़े संग माणसिया।
ऊँवा धा़गा मी आज, धान गया सुहातिया।
मोठ-मूँग-तिल-रांसड़ा, ग्वार गयो कर गासिया।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२०)
कड़िये कनक पाकती, ऊँठ डूब बाजरा।
भर भा़रां घर लावता, भोम लिख्या भाग रा।
ऊँवे पोळछे पाण छड्यो, धरती छड्यो धान।
आभे रंग-रूप छड्यो, मड़दे छड्यो मान।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२१)
काठे खेत री तिंडसी, स्वाद देती साखरा।
ग्वार-फल्ली संग जीमता, कर तूम्बा रा खाखरा।
चोखी चीभ़ड़ी चीरता, आबू चाखता आक रा।
लोभ मन ललचावता, काळीग मतीरा काचरा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२२)
आम्बा आम्बली पाकता, बोरड़ीये राता बोर।
गूंदिये गूंदा झूलता, जाळीये पीलू जोर।
गूंद-चापटिया कूमटे, खेजड़िये खोखा खोर।
नीम्ब निम्बोळी नाचती, कैर-पाका रो थो दौर।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२३)
चौमासे मी चाखता, खुम्भा-खुम्भी घणा।
मामा मोळी मरेड़ो, घोलांह करेला चणा।
पीता चाखता पांतळी, काचा गाघेटा हरा।
धोरे जोगीड़ा झूलता, गूँढ़ीर बूँठा तणा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२४)
बिजळीयाँ- बैलज्जियाँ, आभा तिना लाज।
म्हारो बालमो घरे नहीं, तूं घोर दे मत गाज।
आक रे डोडे-भीम रे गोडे, भीम सराय-भीम सहाय।
ओ बरसाळा बीत गया, शबद गया साज।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२५)
चम्पो मरूओ केवड़ो, सुगन री सँभाळ।
गहरी छाया फळ घणा, डाळा घणा विशाल।
याद आवे बातड़ी, ऊभा सरवर पाळ।
ओ झाड़खा झड़ गया, दीठा घणा डुकाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२६)
पग-पल्लकाँ-पाधरे करता, ओ प्रेम प्रकाश।
आज उथिये प्रीतड़ी, गयी कोस पच्चास।
मिनख निको मिरू, ऊँवा मड़ा मी आज।
मीठा मोर पपैहिया, बोलता बारह मास।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२७)
ऊँठ बघिया झूलता, पीतल जड़्या पळाण।
थुंभी डूंगरा दीसती, काळा कैश कपाळ।
गादिये गुलड़ा शोभता, पड़छी पल्ला चार।
गासिये कर हालता, डोढ़ा तंगड़ा ताण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२८)
गोडे गोडीया बाँधता, गळीये गूघर माळ।
मुखड़े मोहरा चाड़ता, बगसे जड़ी मुहार।
माथे बैठ शोभता, मुच्छ बंकी मोटियार।
हींचक हीले हालता, दे सज्जण घर ज्वार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२९)
घणथुंभी थूळ जाती, लारोलार भै़कर।
भे़गर बकरा भा़ढ़ती, सांख खेजड़िये चार।
ऊँवे साँढ़ीये आज, पड़ी वक्त री मार।
ओ मईड़ा मर गया, पाकेट कपरे पार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३०)
घण लरड़ी-घण बाकरी, घर-घर घणो धण।
गाँया गोरड़ी-चार मोरड़ी, दूधे भर-भर थण।
ऊन ओरड़ी-जट कोटड़ी, कातता कई-कई मण।
छांगा-ढूळा ढ़ळ गया, गया ग्वाल गैडियाँ खण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३१)
मिळ मोकळा जूना डोकरा, काळी कातता जट।
गाँव-गाँमड़े पाळा पूगता, मोटियार ना के हट।
एक बोलता चार आवता, काम करता झट।
मड़दे गयो मट, जिथिये रयो पद रो भ़ट।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३२)
माथे चाड़ माळे, गोफ़ण गिलोला मारता।
ठक्का पड़तो ताट रो, पड़्या झाड़ उडावता।
लूखी-सूखी सुख री, कांदे साथे खावता।
ओ दिनड़ा देश रा, मदरा-मदरा जावता।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३३)
रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळा रो ढिग।
अँगूर धाट धरा रा, पीलू पीळा टिग।
कोडे कोकड़ खावता, किसमिस थली सिग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३४)
तूं तळे री धणियांणी, भे़गो कर भ़च्चा।
पैयाळ पाणी काढ़ता, कर-कर हऊ पच्छा।
भै़ंसी बरत भा़ळता, कोस भरता कच्चा।
जांतरा भर लावता, साथीड़ा गदिया सच्चा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३५)
दूध ताणिये-अट्टो टसीये, रोटी धा़न्गी धार।
लूण कुलड़ी-खट्टो लोटकी, दही माटला-मार।
गाठ हांडिये-डोई मंडिए, खाता कांसीये ठार।
आँगण राखता आँथणी, माथे ढ़ाबरो ढ़ाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३६)
चोक बोरीयो चाड़ता, बोरी बू खुथी।
जालंग जोर भरावता, माथे रेवे सुती।
जठ-ओठे री जीरोई, कौशल पैरता जुती।
आज साधन अणुता, पण ओ बात उती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३७)
दीप मन रा दीपावती, रूड़ी रैण रिझावती।
ओछो शोर, प्रीत घणी, देश दीयाळी आवती।
छोटो-मोटो काच्चर मीठो, कोठा धान भरावती।
घण शोर गरजावती, दीसे रीतां जावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३८)
हळीये खेत खेड़ावती, टाबर टोळी कहलावती।
परब हाळीयो पाळती, समझू सुघन सुझावती।
खीच बाजरियो खावती, आखातीज आवती।
ब़ीला भैळी भागती, गुळभाणी गयी गावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३९)
गैर फागण गावती, हर्षे होळी आवती।
कोडे पेहळाद काढ़ता, झाळ लंक दिश जावती।
जोत चूल्हे भे़ळता, चिटक सुगन चड़ावती।
आज धुडे़ली आवती, फिरे मुँह लुकावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४०)
तीज-तीजणी राखती, उभछठ ऊभी रात।
घण गजुआ तैरावटी, जीमती सतुवे साथ।
ईसर ऊजती-गवर पूजती, गणगौर घुड़ला घात।
राख निर्जळ ग्यारस, करती कानूडे़ री बात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४१)
तीस रोज़ा राखती, उथिये आती ईद।
मिळ मुबारक देवता, ध़र्ष अँखिये धी़द।
बांघ मुल्ला बोलता, सजदा कर मुर्शिद।
आज निरणा नमाज नी पढ़े, मुँह उतारे मस्जिद।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४२)
साफ़ा पेर सतरंगियाँ, तेवटे दोढो़ पल्लो।
काँधे आंगोछाे राखता, दे आडो टल्लो।
भरतल पेरता मोजड़ी, वेश लागतो भलो।
पेट पाटला मोटियार, घणाे राखता झलो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४३)
काने पेर मुरकी, गोखरू सोन-सरा।
दांते कील सौने री, कळाई चोखा कड़ा।
आंगळीये पेर छलड़ा, अंतर फूम्भा अड़ा।
काछ-कंघों-गोलड़ो, रूमाल राखता बड़ा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४४)
मट राखता मड़दे, झट उठता झाळ।
प्रीत राखता पड़दे, किस्मत लिखी कपाळ।
पाणी राखता पेट, झगड़ो नहीं झिकाळ।
जाता युद्धा मी थेट, छाती कर विशाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४५)
प्रीत-रीत पाखी पड़ी, पड़्या पेट पम्पाळ।
आपो-आप री गरजड़ी, सैणे केड़ी संभाळ।
अँखिये रंग उतरियो, पाणी ढ़ल्यो परणाळ।
हिंया हिम्मत हार मत, देख घणा डुकाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४६)
मन मलाखड़ो, घणो साखरो, बांध रमता संधरे।
भेरू-भलो, झाल-पल्लो, कब्बडी पाळा कपरे।
जेर-लाम्बड़ी, ब्याई-गाजड़ी, रमता रात दिन रे।
दड़ी-दोटा, छोटा-मोटा, रमता इट्टी-डक्करे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४७)
भोपा धूणता- भा़ण खणता, पग पावळीया तणे।
पाप भागता- जिम्मो जागता, कांसिया तम्भूरा खणे।
खण तम्भूरी- पड़ पाबू री, भील सुणाता भणे।
छन्द चारणे- भाट चोपड़े, आवता आदर घणे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४८)
चार चतर गुण नारियां, बेसती ठोड़ बुहार।
बूढ़ा देख आवता, चालती खण तेजार।
आज उथिये धोतिये, करयो खूब बिगाड़।
बैल्लज करे बातियाँ, ऊंचो पेट उगाड़।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४९)
बेड़ला घण ऊँचावती, बैठी कातती सूत।
घण घरटी पीसती, पेट मांही पूत।
ओ जरणी जिलमती, सुघड़ नर सपूत।
आज आठ मन्थ सोवती, काढ़े घणा कपूत।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५०)
कन पनड़ी - पग पोलरी, पायल नैवरा संग।
कड़ कन्दोळो - उर बाड़लो, नथ नक रो नंग।
माथे बोरड़ो - नीचे टीकड़ों, झूमर सरा संग।
रंग रूड़लो - हाथे चूड़लो, रूड़ो राखती रंग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५१)
पेर काँचळी - माथे कुड़ती, ओटण गोटेदार।
पग हिंगळू - हथ मैंदी, माथे सिंहड़ों सार।
गूँथ मिढ़ली - लाँबी चोटली, कांकण डोरा धार।
काढ़ घुंघट - सोहणी सुघट, चालती चतर नार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५२)
सासू-सुसरो सेवती, फिरे उठ पगे लाग।
जेठ-देवर जाणती, आँगण मोटो भाग।
नणद-भोजाईयाँ गावती, काढ़ दैयाणो राग।
आज घर भांगे भूतणी, आधी रातां जाग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५३)
प्रभात उठ पीसती, कनक बाजरी ज्वार।
दिन उगे दीसती, ऊभी भा़डों ब्वार।
पोर दिन चड़ता, रोटी मिळती तैयार।
दोपहर पहला पूगती, भातो खण भतवार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५४)
खुल्ला कैश, माथो उगाड़ो, टीलड़ी निको टीलो।
मुठियो निको खंच, वे़श पेरे बेरंगीलो।
बातां करे विशाळ, मुँडो कर-कर ढी़लो।
राता होठ रंगे घणा, ओढ़ पोमचो पीळो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५५)
बीतण वाळा बीत गया, आवण वाळा आगे।
चल रया सो चोखा है, फेर नी आवे सागे।
अणहोणी होवे नहीं, मेहर मालक सूं मांगे।
सूता पैलाह समरिया, सुख भरी नींदा जागे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५६)
चार दिनां री चानणी, आगे किती क बार।
देश दैयाणो छूट गयो, नयो जग संसार।
ओ बख़त ओर हता, ओर हता नर-नार।
सांइयाँ तांजी सुरत ना, नमन बारम्बार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५७)
मनख जाणे हूं करा, करण वाळो कोय।
मनख बापड़ो कांई करे, हरि करे सो होय।
अकळ आपणी बोळी, काम नी आये कोय।
पल मी उलट-पुलट करे, दुनियां ऊभी जोय।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५८)
घण गया, घण जावसी, और कई नर आवसी।
सत्संग से साथ बैठ, जो गुण गोविंद रा गावसी।
चतर बैठ चौक मी, चर्चा धरम कर चावसी।
सुख-शांति घर घणा, बैठा गंगा नहावसी।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५९)
घड़ी जावे, पुळ जावे, जावे बख़त री भा़र।
कुदरत रे कारणें, जुग जावे चार।
बोल भलाई जावे नहीं, सदा रेवे सँसार।
भीम कहे जगदीश हरे, किरपा कर किरतार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(६०)
बख़त साथी पूरी थई, भाईड़ा राम-राम।
बोल्या चाल्या माफ करजो, याद करजो जाम।
नेक-नीति साथे राखजो, करो घणा काम।
आप बैठा आनंद करो, ले धणी रो नाम।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(६१)
And finally a happily End..🌸