Tuesday, April 30, 2019

क्या तुमने देखा है?

कल का रेगिस्थान आज के वर्तमान से पूछता है, कि क्या तुमने देखा है?- प्रभातकाल में घरटी पीसती माँ की बाहों में ऊँघते बच्चे की खुशी, गोधूलि वैला में खुरों से खनकती खड़तालें, बकरियों की शोरगुल राग को काटती घेटियों की ममता, ढ़लती रात संग कुतों का अलसाना, जुगाली करती बेफिक्र साँसे, मोर मुकूट के मधूर गीत, ढ़लते सूरज को देख चिड़ियों का चहचहाना, पीलू चुगती दोपहर की लू, मिट्टी के बर्तन में मीठे होते कैर, भरी दोपहर में नासका सूँघती औरतें, सांगरी झाड़ते वक्त बच्चे की आंखों में खटकती भेड़-बकरियां, भेड़ो की ओर भागते घेटिये, ढ़लती साँझ के समय लकड़ियों से लदे जन्तरे लाते खर, प्रभात में घरटियों की बुलंद होती आवाजें, बिलोने में मक्खन को ताकती बिल्ली की नज़रें, गाय को नैयजण लगाती माँ को देखता बछड़ा, बाजरे की रोटी पर मक्खन लगाकर जांखळ करता गौधणी, दोपहर को कैर के चूंटे चुगकर अलग करती औरतें, सांढ़ के दूध को तपेले में पीते बच्चे की खुशी, गोधूलि वैला में गूंजती घण्टियों की आवाजें, चांदनी बरसाती ठण्डी रेतीली रातें, झर्र-मर्र करते झेरणे को ताकता कौआ, गेंहू के दलिये से बनी गाठ का झारा करता रेगिस्थान, दोपहर में ऊँठो की दौड़ लगाते सवार, खेजड़ी के सूखे खोखे चुगती औरतें, आक के पत्तो पर चाय पीता बणजारा, चलती कुदालों संग गूँजते हमरचे के गीत, मिट्टी के बर्तन में छाछ गटकते घेटिये, खोखली चारपाई में गुनगुनाते भँवरे, गूंगे के पैरों में धागा बांध उसकी उड़ान का पीछा करते बच्चे, ब्यालू करते समय कुत्ते की नज़रें, बैरी से बरत खींचते नंगे पैर, ऊँठो का अपार प्रेम-प्रसंग, दोपहर को झुलसती लू में कंधे पर लटकती पानी की दीड़ी, उड़ती स्वर्ण रेत के बवंडर, दोपहर को पानी से भरी पख़ाल ढ़ोता ऊँठ, मांगणियारों की खड़ताल संग खनकती ढोलकी का लयमयी तालमेल, तंदूरे संग कांसियों का संगम, आस्था की प्रसाद पर नज़रे जमाये कौए की एकटुकता, अडिग रीति रिवाज पर खरी उतरती साँसे, दानी पुरुष की आँखे, त्यौहारों पर सजती रियाणे, अपनत्व भाव से हाथ फैलाती मनुहारें, भाणी पर घिसते बरत के आकस्मिक टूटने से गूँजी आवाजें, ऊँठो की होड़ से उठता रेत-बवंडर, घोड़ों के एक साथ हिनहिनाने की खुशी, अरटिये से सूत कातती औरतों की एकरूपता, टूटी बरत को पकड़ते जुझारू आदमी का फड़कता दिल, दोपहर को कपड़ा टाँकी पानी की बोतल को सिराणे लगाकर ऊँघता मदमस्त ग्वाला, चीनी की प्लेट से चाय की चुस्की लेते वक्त धूजते झुर्रीदार हाथ, कठान्तरे में रखे मक्खन को निहारती बिल्ली की नजरें, भेड़ो पर चलते कातीये, रलियाँ सीलती औरतों की मण्डली, निम्बोळी के झांरे को लेकर भागता बचपन, रात्रिकालीन जागरण में बजते तन्दूरे की राग, दीपावळी को मतीरे अन्दर जलता दीया, रोते बच्चे के माथे से जूएँ निकालते झुर्रीदार हाथ,मनुहार के सुरीले गीत, मोर पंख को ढूंढ़ते बच्चों की आतुरता।
(Photo : Mool Singh Rathore)

Saturday, April 27, 2019

गुजरे वक़्त की वर्तमान से भिड़त

वर्तमान रेगिस्थान के परिपेक्ष में, नब्बे वर्षीय वृद्ध अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए, अपने संग बुढ़े हुए रेगिस्थान की आज से तुलना कर कहते हैं, कि-
ओ बख़त बह गया,
बातां गयी बिसर।
कदेक अवळू आवसी,
जो बैठा चितर।।
फ़ोटो : चितरिंग बा
दिन गया दीसता, रूपाळी गई रातां।                   
करता बैठा डोकरा, जुग जूने री बातां।
गया पाणी पीवता, खोफ़ खारो खावता।
हमें वारों आपरो, कह गया जावता-जावता।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०१)

रेता जिथिये रत उथीये, रया जांतरा हाल।
हिणा देखता उथिये, तो घणा बळे आन्तरा।
उठ सामां आवता, सुगन मिळता सांतरा।
हिंयो हुलाती हँसता, उथीये किस्सा भ्रांत-रा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०२)

पेल नैण परखता, पाछे परखता भ़ेण।
कोस भर आता लैण, सामां देखत सैण।
हँसे कोडे धापता, रेता कई-कई रैण।
उगे-आथवें री भाण नहीं, जद बैसता मन री कैण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०३)

बेसण राखता बाजठो, हाथ जोड़ होशियार।
माथे नेह राखता, प्राण कर न्योछार।
भोजन थाळ भरावता, कर-कर डोढ़ी मनुहार।
लाड कोड सूं जिमावता, दे-दे कोळीया चार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०४)

काले पिरा जावजो, रहो आजोड़ी रात।
थे कद पाछा आवसो, करा मन री बात।
ओ दिनड़ा दूर गया, गयी मदरी रात।
संग छूटा सैणा रा, रयी मन री बात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०५)

मन मिळतो मानखो, जिथिये गुण मिळता ज्ञान।
साम्भळता दे-दे ध्यान, कर-कर ऊभा कान।
मोह मिळे नहीं मान, उथिए गयी आन।
आज बातां ऊभरी, छूटा कदरदान।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०६)

आवता देख ऊठता, मिळता गळ-बाँह दे।
उथीये देख ऊँगाणा, अपणापण रो आयो छे।
तेल खुटा दीप का, छूटा नाता-नेह।
बिन बादळ-बिन बिजळी, केड़ा बरसे मेह।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०७)

केना का-कुण सुणे, मन अपणे री बात।
जिको साथी संग रा, छुड़ाय गया हाथ।
मिनख गया मोकळाए, गयी मिनखा री बात।
ऊमर साथे उधारणा, गहरी कर गया घात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०८)

मगरे बेस मोरिया, कळाक करता जोर।
आज उथिये बैठा, गुगू देवे घोर।
अमलां साथे ऊठता, गळता चारे पोर।
ओ ओतारा उठ गया, गासण खा गया ढोर।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०९)

हैमर जिथिये हींसता, रींजता जिथिये राज।
उथिये ऊभा आज खर, भान्ध मोटे भूँके।
कविया-गविया चल गया, राग-रागिणे सूके।
आज उथिये कूतरा, कर मूंह ऊंचा कूके।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१०)

कवियां संग कोयलां, करती जिथिये किलोल।
श्रवण साखरा लागता, हिंयो देतो हिलोल।
छंद गाजता चारणा, भाट चोपड़ा खोल।
कविये छोड़्या बोल, जिथिये जाणे नी कोई मोल।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(११)

झेडर,अरणी,रायचन्द,चिरमी,डोरो चसिया।
मणिधर,मखणो,मोरियो, विरहीजण राग उदासिया।
ओ मैरासी मर गया, जो रहता राज मन बसिया।
कविया-गविया की करे, गया राग पुछाण रसीया।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१२)

नर-नगारा गूँजता, जोगिये मुरली जाण।
ढोल-डांडिये रमता, घोळ कर घमसाण।
चंग हूंगरे चालता, पैरुवे पाबा पिछाण।
बंशी मदरी बाजती, ऊँची थळीये आण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१३)

धड़ उठता भड़कता, आता कोई काज।
दुःख दूजैरा देखता, सुख आपरा साज।
धीरज घण बंधावता, राख हींये राज।
उथिये दीठा आज, लोको छड गया लाज।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१४)

सूखा जिथिये सरवर, उथिये पीयण री आश।
मन के मैड़ी चड़ा, जाऊं सैणा रे पास।
ओ मनख मिट गया, होत गया हतास।
हेत प्रीत के कारणे, भूला फिरे उदास।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१५)

जिके रूंखड़े चकुओ-चकवी, करता रैण निवास।
परबीति पड़्या सुणावता, काढ़ मुख मिठास।
पग पाळा पंथिया, सुख रा लेता स्वांस।
ओ रूंखड़ा रुळ गया, उड़ गया पंछी आकाश।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१६)

गऊवां दुहाड़ती गोरड़ी, होता बिलाणा हमेश।
दूध-दही रा दरिया, बेहता जिथिये विशेष।
लौटो छाछ रो रावळे, उथिये दीठो अवेश।
मुंह उतार मानखो, दर-दर फिरे दरवेश।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१७)

रूड़ो सावण भादरो, मेघ मलार गावतो।
निर्मल नीर अपार, मनख मवेशी पावतो।
गाज घण कर जावतो, झड़ी मेह बरसावतो।
रूड़ो धरणी रूप, जिथिये इन्दर देखण आवतो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१८)

छीलर टोभा छलकता, दे-दे लाँबी उछात।
देख मन मुळकता, हिंयो देतो हुलास।
तालर देख तिड़कता, अँखिये सूखी आश।
उथिये सूखो आज, घण हरियो भात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१९)

हळ भेळो हमरचो, जिथिये नैदाण काढ़ता लासिया।
राणलिये संग खूँटता, जिथिये महीड़े संग माणसिया।
ऊँवा धा़गा मी आज, धान गया सुहातिया।
मोठ-मूँग-तिल-रांसड़ा, ग्वार गयो कर गासिया।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२०)

कड़िये कनक पाकती, ऊँठ डूब बाजरा।
भर भा़रां घर लावता, भोम लिख्या भाग रा।
ऊँवे पोळछे पाण छड्यो, धरती छड्यो धान।
आभे रंग-रूप छड्यो, मड़दे छड्यो मान।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२१)

काठे खेत री तिंडसी, स्वाद देती साखरा।
ग्वार-फल्ली संग जीमता, कर तूम्बा रा खाखरा।
चोखी चीभ़ड़ी चीरता, आबू चाखता आक रा।
लोभ मन ललचावता, काळीग मतीरा काचरा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२२)

आम्बा आम्बली पाकता, बोरड़ीये राता बोर।
गूंदिये गूंदा झूलता, जाळीये पीलू जोर।
गूंद-चापटिया कूमटे, खेजड़िये खोखा खोर।
नीम्ब निम्बोळी नाचती, कैर-पाका रो थो दौर।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२३)

चौमासे मी चाखता, खुम्भा-खुम्भी घणा।
मामा मोळी मरेड़ो, घोलांह करेला चणा।
पीता चाखता पांतळी, काचा गाघेटा हरा।
धोरे जोगीड़ा झूलता, गूँढ़ीर बूँठा तणा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२४)

बिजळीयाँ- बैलज्जियाँ, आभा तिना लाज।
म्हारो बालमो घरे नहीं, तूं घोर दे मत गाज।
आक रे डोडे-भीम रे गोडे, भीम सराय-भीम सहाय।
ओ बरसाळा बीत गया, शबद गया साज।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२५)

चम्पो मरूओ केवड़ो, सुगन री सँभाळ।
गहरी छाया फळ घणा, डाळा घणा विशाल।
याद आवे बातड़ी, ऊभा सरवर पाळ।
ओ झाड़खा झड़ गया, दीठा घणा डुकाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२६)

पग-पल्लकाँ-पाधरे करता, ओ प्रेम प्रकाश।
आज उथिये प्रीतड़ी, गयी कोस पच्चास।
मिनख निको मिरू, ऊँवा मड़ा मी आज।
मीठा मोर पपैहिया, बोलता बारह मास।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२७)

ऊँठ बघिया झूलता, पीतल जड़्या पळाण।
थुंभी डूंगरा दीसती, काळा कैश कपाळ।
गादिये गुलड़ा शोभता, पड़छी पल्ला चार।
गासिये कर हालता, डोढ़ा तंगड़ा ताण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२८)

गोडे गोडीया बाँधता, गळीये गूघर माळ।
मुखड़े मोहरा चाड़ता, बगसे जड़ी मुहार।
माथे बैठ शोभता, मुच्छ बंकी मोटियार।
हींचक हीले हालता, दे सज्जण घर ज्वार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२९)

घणथुंभी थूळ जाती, लारोलार भै़कर।
भे़गर बकरा भा़ढ़ती, सांख खेजड़िये चार।
ऊँवे साँढ़ीये आज, पड़ी वक्त री मार।
ओ मईड़ा मर गया, पाकेट कपरे पार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३०)

घण लरड़ी-घण बाकरी, घर-घर घणो धण।
गाँया गोरड़ी-चार मोरड़ी, दूधे भर-भर थण।
ऊन ओरड़ी-जट कोटड़ी, कातता कई-कई मण।
छांगा-ढूळा ढ़ळ गया, गया ग्वाल गैडियाँ खण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३१)

मिळ मोकळा जूना डोकरा, काळी कातता जट।
गाँव-गाँमड़े पाळा पूगता, मोटियार ना के हट।
एक बोलता चार आवता, काम करता झट।
मड़दे गयो मट, जिथिये रयो पद रो भ़ट।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३२)

माथे चाड़ माळे, गोफ़ण गिलोला मारता।
ठक्का पड़तो ताट रो, पड़्या झाड़ उडावता।
लूखी-सूखी सुख री, कांदे साथे खावता।
ओ दिनड़ा देश रा, मदरा-मदरा जावता।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३३)

रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळा रो ढिग।
अँगूर धाट धरा रा, पीलू पीळा टिग।
कोडे कोकड़ खावता, किसमिस थली सिग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३४)

तूं तळे री धणियांणी, भे़गो कर भ़च्चा।
पैयाळ पाणी काढ़ता, कर-कर हऊ पच्छा।
भै़ंसी बरत भा़ळता, कोस भरता कच्चा।
जांतरा भर लावता, साथीड़ा गदिया सच्चा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३५)

दूध ताणिये-अट्टो टसीये, रोटी धा़न्गी धार।
लूण कुलड़ी-खट्टो लोटकी, दही माटला-मार।
गाठ हांडिये-डोई मंडिए, खाता कांसीये ठार।
आँगण राखता आँथणी, माथे ढ़ाबरो ढ़ाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३६)

चोक बोरीयो चाड़ता, बोरी बू खुथी।
जालंग जोर भरावता, माथे रेवे सुती।
जठ-ओठे री जीरोई, कौशल पैरता जुती।
आज साधन अणुता, पण ओ बात उती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३७)

दीप मन रा दीपावती, रूड़ी रैण रिझावती।
ओछो शोर, प्रीत घणी, देश दीयाळी आवती।
छोटो-मोटो काच्चर मीठो, कोठा धान भरावती।
घण शोर गरजावती, दीसे रीतां जावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३८)

हळीये खेत खेड़ावती, टाबर टोळी कहलावती।
परब हाळीयो पाळती, समझू सुघन सुझावती।
खीच बाजरियो खावती, आखातीज आवती।
ब़ीला भैळी भागती, गुळभाणी गयी गावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३९)

गैर फागण गावती, हर्षे होळी आवती।
कोडे पेहळाद काढ़ता, झाळ लंक दिश जावती।
जोत चूल्हे भे़ळता, चिटक सुगन चड़ावती।
आज धुडे़ली आवती, फिरे मुँह लुकावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४०)

तीज-तीजणी राखती, उभछठ ऊभी रात।
घण गजुआ तैरावटी, जीमती सतुवे साथ।
ईसर ऊजती-गवर पूजती, गणगौर घुड़ला घात।
राख निर्जळ ग्यारस, करती कानूडे़ री बात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४१)

तीस रोज़ा राखती, उथिये आती ईद।
मिळ मुबारक देवता, ध़र्ष अँखिये धी़द।
बांघ मुल्ला बोलता, सजदा कर मुर्शिद।
आज निरणा नमाज नी पढ़े, मुँह उतारे मस्जिद।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४२)

साफ़ा पेर सतरंगियाँ, तेवटे दोढो़ पल्लो।
काँधे आंगोछाे राखता, दे आडो टल्लो।
भरतल पेरता मोजड़ी, वेश लागतो भलो।
पेट पाटला मोटियार, घणाे राखता झलो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४३)

काने पेर मुरकी, गोखरू सोन-सरा।
दांते कील सौने री, कळाई चोखा कड़ा।
आंगळीये पेर छलड़ा, अंतर फूम्भा अड़ा।
काछ-कंघों-गोलड़ो, रूमाल राखता बड़ा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४४)

मट राखता मड़दे, झट उठता झाळ।
प्रीत राखता पड़दे, किस्मत लिखी कपाळ।
पाणी राखता पेट, झगड़ो नहीं झिकाळ।
जाता युद्धा मी थेट, छाती कर विशाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४५)

प्रीत-रीत पाखी पड़ी, पड़्या पेट पम्पाळ।
आपो-आप री गरजड़ी, सैणे केड़ी संभाळ।
अँखिये रंग उतरियो, पाणी ढ़ल्यो परणाळ।
हिंया हिम्मत हार मत, देख घणा डुकाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४६)

मन मलाखड़ो, घणो साखरो, बांध रमता संधरे।
भेरू-भलो, झाल-पल्लो, कब्बडी पाळा कपरे।
जेर-लाम्बड़ी, ब्याई-गाजड़ी, रमता रात दिन रे।
दड़ी-दोटा, छोटा-मोटा, रमता इट्टी-डक्करे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४७)

भोपा धूणता- भा़ण खणता, पग पावळीया तणे।
पाप भागता- जिम्मो जागता, कांसिया तम्भूरा खणे।
खण तम्भूरी- पड़ पाबू री, भील सुणाता भणे।
छन्द चारणे- भाट चोपड़े, आवता आदर घणे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४८)

चार चतर गुण नारियां, बेसती ठोड़ बुहार।
बूढ़ा देख आवता, चालती खण तेजार।
आज उथिये धोतिये, करयो खूब बिगाड़।
बैल्लज करे बातियाँ, ऊंचो पेट उगाड़।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४९)

बेड़ला घण ऊँचावती, बैठी कातती सूत।
घण घरटी पीसती, पेट मांही पूत।
ओ जरणी जिलमती, सुघड़ नर सपूत।
आज आठ मन्थ सोवती, काढ़े घणा कपूत।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५०)

कन पनड़ी - पग पोलरी, पायल नैवरा संग।
कड़ कन्दोळो - उर बाड़लो, नथ नक रो नंग।
माथे बोरड़ो - नीचे टीकड़ों, झूमर सरा संग।
रंग रूड़लो - हाथे चूड़लो, रूड़ो राखती रंग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५१)

पेर काँचळी - माथे कुड़ती, ओटण गोटेदार।
पग हिंगळू - हथ मैंदी, माथे सिंहड़ों सार।
गूँथ मिढ़ली - लाँबी चोटली, कांकण डोरा धार।
काढ़ घुंघट - सोहणी सुघट, चालती चतर नार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५२)

सासू-सुसरो सेवती, फिरे उठ पगे लाग।
जेठ-देवर जाणती, आँगण मोटो भाग।
नणद-भोजाईयाँ गावती, काढ़ दैयाणो राग।
आज घर भांगे भूतणी, आधी रातां जाग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५३)

प्रभात उठ पीसती, कनक बाजरी ज्वार।
दिन उगे दीसती, ऊभी भा़डों ब्वार।
पोर दिन चड़ता, रोटी मिळती तैयार।
दोपहर पहला पूगती, भातो खण भतवार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५४)

खुल्ला कैश, माथो उगाड़ो, टीलड़ी निको टीलो।
मुठियो निको खंच, वे़श पेरे बेरंगीलो।
बातां करे विशाळ, मुँडो कर-कर ढी़लो।
राता होठ रंगे घणा, ओढ़ पोमचो पीळो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५५)

बीतण वाळा बीत गया, आवण वाळा आगे।
चल रया सो चोखा है, फेर नी आवे सागे।
अणहोणी होवे नहीं, मेहर मालक सूं मांगे।
सूता पैलाह समरिया, सुख भरी नींदा जागे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५६)

चार दिनां री चानणी, आगे किती क बार।
देश दैयाणो छूट गयो, नयो जग संसार।
ओ बख़त ओर हता, ओर हता नर-नार।
सांइयाँ तांजी सुरत ना, नमन बारम्बार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५७)

मनख जाणे हूं करा, करण वाळो कोय।
मनख बापड़ो कांई करे, हरि करे सो होय।
अकळ आपणी बोळी, काम नी आये कोय।
पल मी उलट-पुलट करे, दुनियां ऊभी जोय।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५८)

घण गया, घण जावसी, और कई नर आवसी।
सत्संग से साथ बैठ, जो गुण गोविंद रा गावसी।
चतर बैठ चौक मी, चर्चा धरम कर चावसी।
सुख-शांति घर घणा, बैठा गंगा नहावसी।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५९)

घड़ी जावे, पुळ जावे, जावे बख़त री भा़र।
कुदरत रे कारणें, जुग जावे चार।
बोल भलाई जावे नहीं, सदा रेवे सँसार।
भीम कहे जगदीश हरे, किरपा कर किरतार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(६०)

बख़त साथी पूरी थई, भाईड़ा राम-राम।
बोल्या चाल्या माफ करजो, याद करजो जाम।
नेक-नीति साथे राखजो, करो घणा काम।
आप बैठा आनंद करो, ले धणी रो नाम।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(६१)

And finally a happily End..🌸

Wednesday, April 10, 2019

मनगढ़त बहादूरी का विमोचन

रेगिस्थान के लोग आस्थाओं के अस्तित्व को सिद्ध करने हेतु अफवाहों की मनगढ़त कहानियों का सहारा लेते हैं। वे अपनी बहादुरी के मनगढ़त किस्से गर्व के साथ सुनाते हैं। वे अपनी बलिष्ठ बाजुओं से भूतों के साथ, रात भर खेली गई कुश्ती की कथा का सुबह कोटड़ी में विमोचन करते हैं। तथा अन्य सभी को विश्वास दिलाते है, कि वे भी बहादुरी की मिसाल हैं। वे भूत के उल्टे पैरो से लेकर उसके रंग-रूप तक का बारीकी से विवरण करते हैं। कहानियों का दौर चल ही रह था, कि इतने में एक दीपक के अचानक गायब होने की दूसरी कहानी शुरू कर दी जाती हैं। कि जब कभी वे अपनी गाय या भेड़-बकरी को ढूंढ़ने निकल जाया करते थे, तो रात के समय एक जलता हुआ दीपक उनका पीछा करता था और फिर वह अचानक ही वहां से गायब हो जाया करता था।
इतने में चिलम की फूंक लगाते हुए, अस्सी वर्षीय चुतरिंग भी अपनी कहानी सुनाते हैं, कि कैसे उन्होंने भूतों के पूरे झुण्ड को मात दी थी। और फिर सभी अपने-अपने बहादुरी के चर्चे चिलम की फूंक लगाते हुए बताने लगते हैं। तथा एक दूसरे की बहादुरी के बखाण करने लगते हैं। वे आस-पास के अन्य गांवों के भी चर्चे सुनाते हैं। वहां के बलिष्ठ बाजुओं की जमकर तारीफें करते हैं। वे समीपवर्ती गांव के किसी रतनिंग की कहानी बताते हैं, कि वे इतने बहादूर थे कि भूत की छाती पर रात भर बैठे रहे थे। भूत उनसे हाथ जोड़, विनती करते हुए अपनी जान बचाकर भागा था।
यह सब सुनते ही मुझसे रहा नहीं गया, मैंने तुरंत पूछ लिया कि क्या भूतों में भी जान होती है? और होती भी है तो क्या वे इतने विनम्र है, कि हाथ जोड़कर विनती करते है? इतना सुनते ही सारी घूरती हुई नजरें एक साथ बोल पड़ती है, कि अभी तू बच्चा है।, तूने दुनियाँ नहीं देखी हैं।, भूतों की बातें खुल्ले आम नहीं किया करते हैं। चल अब बहुत हो गयी है तैरे लिए कहानियाँ, जा हमारे लिए चाय लेकर आ। और चिलम के उठते धुँए के साथ-२ मुझे भी वहाँ से गायब कर दिया।
लेकिन वास्तविकता तो यह है कि लोग आस्थाओं को जुती की ठोकरों तल्ले बुनते हैं। झूठी प्रशंसा के चक्कर में अफवाहों को हवा देते हैं। वे विज्ञान की भाषा को पूर्णतः नकारते हैं। वे विज्ञान को मात्र किताबी ज्ञान बताकर उसकी व्यापक वास्तविकता को नकारते हैं। और अन्ततः अपनी ही बात पर अडिग रहते हैं। अगर कोई उनसे हिम्मत जुटाकर कह भी दे, कि हे! सज्जन आप गलत हो। तो वे उसे ज्यादा क़िताबों के पढ़ने का असर बताकर, पागल घोषित कर देते हैं।
फ़ोटो : चुतरिंग बा

#विज्ञानबनाममानव।

Monday, April 8, 2019

हथेली पर खुलती अफीम की थिगड़ियाँ

रेगिस्थान में आस्थाएं सिर चढ़ कर बोलती हैं। लोग आस्थाओं को सर्वेसर्वा मानते हैं। हर दुःख का निवारण आस्थाओं में ढूंढ़ते हैं। यहाँ तक कि, बुखार का भी सॉल्यूशन आस्थाओं में ढूँढा जाता हैं। सिर पर सात बार आखा घुमाते हुए झुर्रीदार हाथ, पांच रुपये का सिक्का अपने पल्ले बांध देते हैं। और कौन सी परलौकिक शक्ति आपसे नाराज है, यह अगले ही दिन भोपियाँ तय कर देती हैं। और आस्था के नाम पर नासका सूंघने लगती हैं।
भोपियों की कही हुई बात को टालना भी एक अपराध माना जाता हैं। इनकी एक अद्भुत खासियत है, कि ये बिना किसी ईश्वरीय दोष के किसी को भी वापस नहीं लौटाती हैं। इनके पास सबकी सूची है- देवी-देवता से लेकर, दरगाह में सोए अकबर तक की।
फ़ोटो : प्रेमाजी
इन्ही की आड़ में देर रात को पाळीये पर उठता है- बिड़ियों का धुँआ, हथेलियों पर खुलती है अफीम की थिगड़ियाँ, स्टील की बट्टी में घुलती है साँसों की बन्द थैलियाँ, और चिलम की साफ़ी संग मृत्यु से आंखमिचौली खेलता हुक्के का धुँआ। और सब दोष धर दिया जाता है भक्ति की शक्ति पर। सुबह होने से पहले कड़ाइये में भूंजे जाते है तैलीय चाटुवे। और चूल्हे में जल रहा होता है गरीब का परिवार।
सब कुछ यहीं पर खत्म नहीं होता है। भोपियाँ फिर मांगती हैं, आने वाले अगले महीने की चान्दनी चौदस को डेढ़ सौ किलोमीटर दूर बकरे की बलि। सिर पर कर्ज की पौटली रखे, वह मजबूरन एक झटके में उठता सिर उड़ाता है। यहाँ भी डर है उसको, कि कईं आस्थाएं खण्डित न हो जाएं।
कुछ दिनों बाद फिर 'घुटी' आयी चान्दनी बारस को। भोपियाँ बिजी थी तैरस को। इसलिए चौदस को मुसाफ़िर पहुंचा भोपी के द्वार। उसने बताई आप-बीती कहानी। भोपी ने देखे आखे और बताया कल आने वाली चान्दनी पूनम का दोष। पुनः जुट गया कर्जी गरीब मजदूर, दूसरी बलि की तैयारियों में। और फिर ता-उम्र इसी में गुजार गई। किन्तु आस्थाएँ आज भी उससे नाराज है। आज वह फिर किसी ठेकेदार के यहाँ गया था। उसको फिर आस्थाओं का दोषी ठहरा दिया गया हैं।
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#आखा : मुट्ठी में बंद गेंहू के 10-12 दानें।
#घुटी : एक मानसिक बीमारी।
#चाटुवा : किसी खाद्य वस्तु को भूंजने या सेकने हेतु प्रयुक्त लकड़ी का बना हुआ डण्डा।
#थिगड़ियाँ : पौटलियाँ।
फ़ोटो : पेमोजी
फ़ोटो : पेमोजी

Photo : Mool Singh Rathore



Saturday, April 6, 2019

झबरा : भीगता मौन बचपन

सर्दियां भाग रही थी,बच्चे खुश थे। कुसुम और शांति तो बहुत खुश थे, क्योंकि उनके पापा आज शहर से घर जो लौटे थे। छुट्टी की घण्टी बजते ही बस्ता पटक विद्यालय के मुख्य द्वार से पहले निकलने की होड़ मच जाती हैं। आज शांति ने बाजी मारी थी इसलिए डिंपल पूरी कक्षा से नाराज़ हैं। डिंपल का कहना हैं कि शांति अपना बैग लेकर नहीं भागी थी, उसने सबके साथ चीटिंग की हैं। और बाकी वाले बच्चे उसे कुछ भी नहीं बोल रहे हैं, इस कारण वह शांति और अन्य सभी से हमेशा के लिए दोस्ती तोड़ चुकी हैं। अब वह अपनी पानी की बोतल किसी को नहीं देगी। और न ही अब वह एक रुपये वाली चॉकलेट का सातवां हिस्सा किसी को देगी। और कभी भी उनके साथ में नहीं बैठेगी। झबरे से तो मानो पूरी कक्षा नाराज थी, क्योंकि वह पहली बार दूसरे स्थान पर आया था। सबका कहना था कि वह छुट्टी की घंटी बजने से एक मिनट पहले ही कक्षा से भाग निकला था और उसका बेग अभी भी कक्षा में ही हैं। आज उसे पूरी उम्मीद थी कि वह पहला नम्बर लाकर सबको अचम्भित कर देगा, किन्तु वह यह करने में फिर से नाकाम रहा। झबरा तो केवल शांति से ही नाराज था,उसका कहना था कि शांति उसे धक्का देकर प्रथम आयी हैं। उसकी नाराजगी तो जायज़ लग रही थी पर ओर कुछ नहीं बोला। चुपचाप वापस लौट गया अपना बैग ढूंढने। उसे वापस स्कूल जाता देख सभी बच्चे उसे चिड़ा रहे थे, पर वह अपनी धुन में खोया हुआ था। शायद सोच रहा था, कि कल दो मिनट पहले भागकर सबको पीछे छोड़ दूंगा और फिर हसूंगा पूरी स्कूल पर।
(Photo : Mool Singh Rathore)
हर तस्वीर की एक कहानी होती हैं। दूसरे दिन की बात हैं। शान्ति बहुत खुश दिख रही थी, किन्तु डिम्पल सब से नाराज अपनी पूरी भरी हुई पानी की बोतल लिए कक्षा के कोने में अकेली बैठी थी। कोई उससे बात भी करने जाता तो वह अपना मुंह दीवार की ओर कर लेती तथा उसको अनसुना कर देती थी। दोपहर की घण्टी बजी, तो सभी बच्चे मिड-डे-मील हेतु रसोई की ओर भागने लगे। सबको भागता देख डिंपल भी उनके साथ भागने लगी और बीच रास्ते में ही अपनी सारी नाराजगी भूल गयी। अब वह शान्ति, अरुणा व कुसुम के साथ 'ताळी दे, तपाड़ी दे' का खेल खेलते हुए साथ में भोजन कर रही थी। अब उसकी पानी की बोतल भी खाली होने लगी थी। बाद में फिर वे सब 'सतोलिया' खेलने लग गये। पुनः रेस्ट बन्द की घंटी बजने पर सभी अपनी-अपनी कक्षा की ओर भागने लगे। डिम्पल भी अपनी बोतल भरकर कक्षा की ओर भाग गई। और थोड़ी ही देर बाद उसने पुनः बदमाशी करना शुरू कर दिया था, क्योंकि घण्टी बजने के तकरीबन पौने घंटे बाद ही, झबरा उसकी शिकायत लेकर प्रधानध्यापकजी के पास आया था। शिकायत थी कि वह सो रहा था, तब डिम्पल ने उसके कान में ठण्डा पानी डाल दिया। और तब से उसे उस कान से सुनाई नहीं दे रहा हैं। शिकायत सुनते ही प्रधानध्यापकजी ने कक्षा की ओर देखा तो सारे बच्चे मुंह पर हाथ रखे, खिड़की में से झबरे को देखते हुए हंस रहे थे। यह देख प्रधानध्यापकजी के लबों पर मुस्कान आ गयी और उन्होंने झबरे को मुस्कुराते हुए समझाकर पुनः कक्षा की ओर भेज दिया। कक्षा की ओर जाते समय झबरे की आंखे लाल तथा नज़रे पैरो पर थी। कक्षा में जाते ही पूरी कक्षा जोर से हंस पड़ी, किन्तु झबरा उन सबको अनसुना करते हुए पुनः कोने में जाकर सो गया। बच्चों ने उसका बैग उठाकर पास वाली कक्षा में रख दिया और सारे बच्चे एक दूसरे की ओर देखते हुए दबी हंसी हंस रहे थे। इतने में हिंदी अध्यापिका ने शांति की ओर इशारे करते हुए छुट्टी की घण्टी लगाने को कहा। सारी कक्षा में हो-लल्ला मच गया। शांति अपना बैग लेकर झूमती हुई घंटी बजाकर स्कूल के मुख्य द्वार की ओर भाग गयी। वह आज भी प्रथम ही आयी। झबरे की नींद खुलना अभी बाकी हैं।         
(Photo : Mool Singh Rathore)
अगले दिन सुबह की घंटी बजी। बच्चे भागते हुए स्कूल पहुंचे। झाड़ू निकाल, प्रार्थना कर अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर निकल गये। सभी खुश दिख रहे थे, क्योंकि अगले दिन रविवार था, और आज होना था बालसभा कार्यक्रम। विचरज दृश्य यह था कि आज शांति और डिंपल की कक्षा में होहल्ला नहीं हो रहा था, सभी बच्चे इतने शांत पहली बार देखे गए थे। उस दिन भी कक्षा में प्रवेशित होते ही सारे बच्चे खड़े होकर, पूरे जोश के साथ, जोर से बोल पड़े,- 'गुड मॉर्निंग सर'। यह होहल्ले के साथ जोश हमेशा से इस कक्षा की खूबी रही हैं। फिर उछलकर, ऊंची जम्प लगाते हुए बेखौफ बैठ गए। तभी तनू ने बताया कि आज झबरा स्कूल नहीं आया हैं। झबरे का नाम सुनते ही सारे बच्चे एक दूसरे की ओर नज़रे घुमाते हुए हँस पड़ते हैं। तभी हिंदी अध्यापिका कक्षा में प्रवेशित होती हैं, सारे बच्चे उनकी ओर ताकते हुए चुप हो जाते हैं। फिर यह कक्षा मौन धारण कर लेती हैं। यह सच है, कि मैडम इन बच्चों पर हमेशा से ही हावी रही हैं। कुछ समय पश्चात दोपहर की घंटी बजती हैं, सभी 'मिड-डे-मील' में व्यस्थ हो जाते हैं। फिर यह सब, मार्च की पतझड़ से होली खेलने लग जाते हैं। आखिर, रेस्ट बन्द की घण्टी बजती हैं। और थोड़ी ही देर बाद, कक्षा में होहल्ला मचना पुनः शुरू हो जाता हैं। अब दृश्य यह था कि सभी बच्चे, 'दोपहर को स्कूल आये' झबरे को घेरकर बैठे थे। इतने में मोती खड़ा होकर बोल पड़ता है, "माड़सा आज झबरा थैला लाना भूल गया" और सारी कक्षा हँस पड़ती हैं। झबरे से थैले के बारे में पूछा गया तो वो नज़र झुकाये हुए, दबे स्वर में बोल पड़ा : 'पांतरो पड़्यो पो माड़सा'। फिर सारी कक्षा जोर-२ से हंसने लग जाती हैं। सबको हंसता देख, झबरा भी हंस पड़ता हैं। और फिर सब झबरे को चिढ़ाने में व्यस्थ हो जाते हैं। कुछ देर पश्चात, बालसभा की घण्टी बजती हैं। सभी शोर मचाते हुए, धक्का-मुक्की करते, बालसभा में पहुंचते हैं। बालसभा में यह कक्षा हमेशा से ही बढ़-चढ़ कर भाग लेती आयी हैं। इसी बीच, बालसभा पूर्ण होने से पूर्व, प्रधानध्यापकजी ने झबरे को ऑफिस से पानी का जग लाने को कहा, तो वह बेरुख मन से ऑफिस की ओर निकल गया। जग भरकर लाने में उसने काफी समय लगा दिया था, और वह अभी तक वापस नहीं लौटा था। इतने में छुट्टी की घण्टी बजती हैं, झबरा बीच रास्ते में जग पटक, मुख्य द्वार की ओर भाग जाता हैं। आज वह पहली बार प्रथम आया था। यह देख सब हैरान थे, पर उसने कोई खुशी जाहिर न की और चुपचाप घर की ओर निकल गया। आज सब उसी की बात कर रहे थे। प्यासे प्रधानध्यापकजी अभी तक झबरे का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि वह उसका स्कूल में अंतिम दिन था। फिर मुड़कर उसने कभी न देखा।
(Photo : Mool Singh Rathore)

होळी : एक थार पर्व

पिछले महीने होली का पर्व था। सुबह हल्की फुल्की लू के साथ होली के पर्व की शुरुआत हुई। होली का पर्व- लू के शुरुआती दिन होते हैं। लोग सुबह से ही एक दूसरे को बधाइयां देने में व्यस्थ हो गये। वे एक दूसरे के साथ मिलकर किसी तीसरे के वहाँ जाते और फिर वे सब मिलकर किसी चौथे के वहाँ जाते। वहाँ जाकर बीड़ी,सिगरेट,अफीम की मनुहार के साथ मीठा भोजन करते। फिर गांव की अपनी बातों में व्यस्थ हो जाते हैं।
शाम के समय बींजा भील आकर लकड़ियों की होली बना देता हैं। सूर्यास्त होने तक तो, सभी युवा खेल के मैदान में ही दिखते हैं। फिर भोजन करके बुजुर्ग और नोजवान युवा, होलिका दहन स्थान की ओर चल देते हैं। फिर सब मिलकर होली के गीत(फ़ाग) गाने लग जाते हैं, "हाय रे होली आयी रे, फागण री मस्ती.."। तब तक बच्चे घर-घर जाकर, "चांचेले बजाकर 'आडो-पाडो' की उखड़ती आवाजों को दुहराते हुए" गुड़, कुळीयाँ*, खींचिये, कोपरे व फूलियाँ* एक बड़ी सी झोली में लेकर आते हैं। साथ में लाते हैं- दो लौटे घी और खूब सारे चांचेले। फिर झोळी में से खाने लायक चीजें सब में बांट दी जाती हैं। और आक की लकड़ी के बने चांचेले, होली के अंदर डाल दिये जाते हैं। बाद में शुभ मुहूर्त पर ग्राम-मुखिया सवाई सिंह होलिका दहन करते हैं। भागता हुआ रविन्द्र जलती आग की लपटों में से प्रह्लाद को खींचकर बाहर निकाल देता हैं। और उसे लेकर होली के चारों ओर, चार चक्कर लगाने लगता हैं, और सब उसके पीछे-पीछे चक्कर लगाते हुए, आग की उठती लपटों को निहारने लगते हैं।
फ़ोटो : होलिका दहन
लोगों में मान्यता है कि होलिका दहन के समय आग की लपटों से निकलने वाले पतंग अगर ध्रुव तारे की विपरीत दिशा में उड़ते हैं, तो इस वर्ष अच्छी बारिश होगी। इस बार अच्छी बारिश होने के संकेत मिले, तो सभी खुश हो गये।
दूसरी मान्यता यह भी है, कि अगर दूसरे गांव का कोई व्यक्ति होली के जलते अँगारे लेकर चला गया, तो इस गांव की बजाय उस गांव में अच्छी बारिश होगी। लोग आस्थाओं और मान्यताओं को सर्वेसर्वा मानते हैं। फिर शुरू हो गयी- पाळा-कब्बडी, जिसमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने भाग लिया। रात को करीबन दो बजे सब हँसी-खुशी घर लौट गये।
अगली सुबह ग्रामीण ओरतें होलिका दहन स्थान पर पूजन कर, खुशहाली की कामना करती हैं। फिर शुरू हो गयी लट्ठमार होली। ओरतें रँग डालने वालों को लट्ठों से कूटने पर उतर आती हैं। होली की यह ग़ैर पूरे दिन तक चली। बिना होळी का रंग लगे कोई न बच पाया।
शाम को जब लू थोड़ी कम पड़ी,तो रेत के टीले पर कुश्ती का आयोजन किया गया। बच्चों ने बढ़ चढ़कर दिलचस्पी दिखाई। फिर दिन ढ़लते ही सब, हारे-थके अपने-२ घर की ओर निकल गये।
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#लट्ठमार होली का मतलब : गांव की औरतें रंग डालने वालों को लट्ठ, गाय के नैयजण(बकरी की ऊन से बनी रस्सी) तथा सौटे(पुराणी ओढ़नी को गूंथकर बनाई रस्सी) से पीटने के लिए पीछे भागती हैं।
#कुलियाँ : तवे पर नमक, मिर्च के साथ सेके गए मतीरे के बीज।
#फूलियाँ : पॉपकॉर्न।
(Photo : Mool Singh Rathore)
(Photo : Mool Singh Rathore)
(Photo : Mool Singh Rathore)

Friday, April 5, 2019

फेफड़े बेचता जयपुर

यह जयपुर में मैरे शुरुआती दिन हैं। आज जयपुर आये सात दिन हो गए हैं, किंतु सुबह की किरण और घर लौटती शाम नहीं देखी हैं। जयपुर को ऊंघते हुए तो शायद किसी ने नहीं देखा हैं। सुबह रफ्तार पकड़ती सड़कों से अचानक नींद खुल जाती हैं। यहाँ की अमीरी-अकड़ गाड़ी की रफ्तार से पहचानी जाती हैं। गाड़ियाँ इतनी की रोड़ क्रॉस करने के लिए हरी बत्ती के बुझने की दुआ करनी पड़ती हैं। यह शहर धुँआ-धुँआ हुआ पड़ा है, इतने दिनों में ही आंखे दर्द करने लग गयी है। एयर पॉल्युशन इतना तेजी से बढ़ रहा है, कि जल्द ही यह शहर सबको चुनोती देगा। खबरदार! हम राजस्थान की राजधानी हैं, हमें हर रेस जीतने की आदत है। नजाने कितनी साँसों को कोने में घोटता होगा, यह शहर।
इस बार तो यहाँ की गर्मी, रेगिस्थान से भी ज्यादा अकड़ रही हैं। वैसे भी रूम से बाहर निकलने का मन नहीं करता है, और ऊपर से यह आग उगलती जयपुर की दोपहरें। रोटी बनाने बैठो तो पसीना आँखों से छलकता हैं। शाम को जब कभी हल्की फुल्की हवा बहने भी लगे, तो गूंज उठती है सड़को की रफ्तार और बालों को छू जाती है पोल्युटेड एयर।
यहाँ साँसे कोई नहीं लेता हैं, सब चौराहे पर फेफड़े बेचते फिर रहे हैं। रेगिस्थानी रातें जितनी ठंडी होती हैं, उतनी ही ऊमस उगल देती है, यह जयपुरी सफेद रातें। रूम की खिड़कियाँ खुलना तो चाहती हैं, पर मजबूर कर दी गयी हैं। धधकती आग की लपटें, आज मरू-मानूस के संग होळी की गैर खेल रही हैं। और धुँए संग घुटती साँसे, सिंध के थार से लौटती हवाओं के झोंके को तरस रही है।
फ़ोटो : जयपुर आर्किटेक्चर
आज तक मैंने जिस जयपुर को तस्वीरों में देखा था, वह हकीकत को किनारे किया हुआ था। आते समय मैंने रिक्शा में से हवामहल के धुंधले, कलात्मक चेहरे को निहारते लम्बे-चौड़े व अनूठे बज़ार को देखा था। जयपुर पुराणी कलात्मक कलाकारी का बेजोड़, अनूठा उदाहरण रहा हैं, और उससे भी अधिक यह शहर, गुलाबी रंगों से व्यवस्थित सजाया गया हैं। आते समय नज़रें इन्ही में खोयी रह गयी।
फ़ोटो : हवामहल, जयपुर
किन्तु आज जयपुर की विडम्बना यह है कि वह अपने तन पर धुँए की कालिख़ पौत रहा हैं। और आज के जयपुर की गुलाबी शामें काले अँधेरे के साये में हैं। फ़रिश्ते कहाँ विराजित हैं?