Saturday, April 6, 2019

झबरा : भीगता मौन बचपन

सर्दियां भाग रही थी,बच्चे खुश थे। कुसुम और शांति तो बहुत खुश थे, क्योंकि उनके पापा आज शहर से घर जो लौटे थे। छुट्टी की घण्टी बजते ही बस्ता पटक विद्यालय के मुख्य द्वार से पहले निकलने की होड़ मच जाती हैं। आज शांति ने बाजी मारी थी इसलिए डिंपल पूरी कक्षा से नाराज़ हैं। डिंपल का कहना हैं कि शांति अपना बैग लेकर नहीं भागी थी, उसने सबके साथ चीटिंग की हैं। और बाकी वाले बच्चे उसे कुछ भी नहीं बोल रहे हैं, इस कारण वह शांति और अन्य सभी से हमेशा के लिए दोस्ती तोड़ चुकी हैं। अब वह अपनी पानी की बोतल किसी को नहीं देगी। और न ही अब वह एक रुपये वाली चॉकलेट का सातवां हिस्सा किसी को देगी। और कभी भी उनके साथ में नहीं बैठेगी। झबरे से तो मानो पूरी कक्षा नाराज थी, क्योंकि वह पहली बार दूसरे स्थान पर आया था। सबका कहना था कि वह छुट्टी की घंटी बजने से एक मिनट पहले ही कक्षा से भाग निकला था और उसका बेग अभी भी कक्षा में ही हैं। आज उसे पूरी उम्मीद थी कि वह पहला नम्बर लाकर सबको अचम्भित कर देगा, किन्तु वह यह करने में फिर से नाकाम रहा। झबरा तो केवल शांति से ही नाराज था,उसका कहना था कि शांति उसे धक्का देकर प्रथम आयी हैं। उसकी नाराजगी तो जायज़ लग रही थी पर ओर कुछ नहीं बोला। चुपचाप वापस लौट गया अपना बैग ढूंढने। उसे वापस स्कूल जाता देख सभी बच्चे उसे चिड़ा रहे थे, पर वह अपनी धुन में खोया हुआ था। शायद सोच रहा था, कि कल दो मिनट पहले भागकर सबको पीछे छोड़ दूंगा और फिर हसूंगा पूरी स्कूल पर।
(Photo : Mool Singh Rathore)
हर तस्वीर की एक कहानी होती हैं। दूसरे दिन की बात हैं। शान्ति बहुत खुश दिख रही थी, किन्तु डिम्पल सब से नाराज अपनी पूरी भरी हुई पानी की बोतल लिए कक्षा के कोने में अकेली बैठी थी। कोई उससे बात भी करने जाता तो वह अपना मुंह दीवार की ओर कर लेती तथा उसको अनसुना कर देती थी। दोपहर की घण्टी बजी, तो सभी बच्चे मिड-डे-मील हेतु रसोई की ओर भागने लगे। सबको भागता देख डिंपल भी उनके साथ भागने लगी और बीच रास्ते में ही अपनी सारी नाराजगी भूल गयी। अब वह शान्ति, अरुणा व कुसुम के साथ 'ताळी दे, तपाड़ी दे' का खेल खेलते हुए साथ में भोजन कर रही थी। अब उसकी पानी की बोतल भी खाली होने लगी थी। बाद में फिर वे सब 'सतोलिया' खेलने लग गये। पुनः रेस्ट बन्द की घंटी बजने पर सभी अपनी-अपनी कक्षा की ओर भागने लगे। डिम्पल भी अपनी बोतल भरकर कक्षा की ओर भाग गई। और थोड़ी ही देर बाद उसने पुनः बदमाशी करना शुरू कर दिया था, क्योंकि घण्टी बजने के तकरीबन पौने घंटे बाद ही, झबरा उसकी शिकायत लेकर प्रधानध्यापकजी के पास आया था। शिकायत थी कि वह सो रहा था, तब डिम्पल ने उसके कान में ठण्डा पानी डाल दिया। और तब से उसे उस कान से सुनाई नहीं दे रहा हैं। शिकायत सुनते ही प्रधानध्यापकजी ने कक्षा की ओर देखा तो सारे बच्चे मुंह पर हाथ रखे, खिड़की में से झबरे को देखते हुए हंस रहे थे। यह देख प्रधानध्यापकजी के लबों पर मुस्कान आ गयी और उन्होंने झबरे को मुस्कुराते हुए समझाकर पुनः कक्षा की ओर भेज दिया। कक्षा की ओर जाते समय झबरे की आंखे लाल तथा नज़रे पैरो पर थी। कक्षा में जाते ही पूरी कक्षा जोर से हंस पड़ी, किन्तु झबरा उन सबको अनसुना करते हुए पुनः कोने में जाकर सो गया। बच्चों ने उसका बैग उठाकर पास वाली कक्षा में रख दिया और सारे बच्चे एक दूसरे की ओर देखते हुए दबी हंसी हंस रहे थे। इतने में हिंदी अध्यापिका ने शांति की ओर इशारे करते हुए छुट्टी की घण्टी लगाने को कहा। सारी कक्षा में हो-लल्ला मच गया। शांति अपना बैग लेकर झूमती हुई घंटी बजाकर स्कूल के मुख्य द्वार की ओर भाग गयी। वह आज भी प्रथम ही आयी। झबरे की नींद खुलना अभी बाकी हैं।         
(Photo : Mool Singh Rathore)
अगले दिन सुबह की घंटी बजी। बच्चे भागते हुए स्कूल पहुंचे। झाड़ू निकाल, प्रार्थना कर अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर निकल गये। सभी खुश दिख रहे थे, क्योंकि अगले दिन रविवार था, और आज होना था बालसभा कार्यक्रम। विचरज दृश्य यह था कि आज शांति और डिंपल की कक्षा में होहल्ला नहीं हो रहा था, सभी बच्चे इतने शांत पहली बार देखे गए थे। उस दिन भी कक्षा में प्रवेशित होते ही सारे बच्चे खड़े होकर, पूरे जोश के साथ, जोर से बोल पड़े,- 'गुड मॉर्निंग सर'। यह होहल्ले के साथ जोश हमेशा से इस कक्षा की खूबी रही हैं। फिर उछलकर, ऊंची जम्प लगाते हुए बेखौफ बैठ गए। तभी तनू ने बताया कि आज झबरा स्कूल नहीं आया हैं। झबरे का नाम सुनते ही सारे बच्चे एक दूसरे की ओर नज़रे घुमाते हुए हँस पड़ते हैं। तभी हिंदी अध्यापिका कक्षा में प्रवेशित होती हैं, सारे बच्चे उनकी ओर ताकते हुए चुप हो जाते हैं। फिर यह कक्षा मौन धारण कर लेती हैं। यह सच है, कि मैडम इन बच्चों पर हमेशा से ही हावी रही हैं। कुछ समय पश्चात दोपहर की घंटी बजती हैं, सभी 'मिड-डे-मील' में व्यस्थ हो जाते हैं। फिर यह सब, मार्च की पतझड़ से होली खेलने लग जाते हैं। आखिर, रेस्ट बन्द की घण्टी बजती हैं। और थोड़ी ही देर बाद, कक्षा में होहल्ला मचना पुनः शुरू हो जाता हैं। अब दृश्य यह था कि सभी बच्चे, 'दोपहर को स्कूल आये' झबरे को घेरकर बैठे थे। इतने में मोती खड़ा होकर बोल पड़ता है, "माड़सा आज झबरा थैला लाना भूल गया" और सारी कक्षा हँस पड़ती हैं। झबरे से थैले के बारे में पूछा गया तो वो नज़र झुकाये हुए, दबे स्वर में बोल पड़ा : 'पांतरो पड़्यो पो माड़सा'। फिर सारी कक्षा जोर-२ से हंसने लग जाती हैं। सबको हंसता देख, झबरा भी हंस पड़ता हैं। और फिर सब झबरे को चिढ़ाने में व्यस्थ हो जाते हैं। कुछ देर पश्चात, बालसभा की घण्टी बजती हैं। सभी शोर मचाते हुए, धक्का-मुक्की करते, बालसभा में पहुंचते हैं। बालसभा में यह कक्षा हमेशा से ही बढ़-चढ़ कर भाग लेती आयी हैं। इसी बीच, बालसभा पूर्ण होने से पूर्व, प्रधानध्यापकजी ने झबरे को ऑफिस से पानी का जग लाने को कहा, तो वह बेरुख मन से ऑफिस की ओर निकल गया। जग भरकर लाने में उसने काफी समय लगा दिया था, और वह अभी तक वापस नहीं लौटा था। इतने में छुट्टी की घण्टी बजती हैं, झबरा बीच रास्ते में जग पटक, मुख्य द्वार की ओर भाग जाता हैं। आज वह पहली बार प्रथम आया था। यह देख सब हैरान थे, पर उसने कोई खुशी जाहिर न की और चुपचाप घर की ओर निकल गया। आज सब उसी की बात कर रहे थे। प्यासे प्रधानध्यापकजी अभी तक झबरे का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि वह उसका स्कूल में अंतिम दिन था। फिर मुड़कर उसने कभी न देखा।
(Photo : Mool Singh Rathore)

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