Friday, January 10, 2020

अन्यथा, कुत्ते मूत रहे होंगे।

धर्म की आड़ में इंसानियत मर रही हैं, क्योंकि सबने अपनी आत्मा जबरदस्ती अपने-२ धार्मिक देवता, स्थल को सौंप रखी है। और उसकी रक्षा का जिम्मा अपने माथे चिपका लिया है। कब कोई धर्म पर उंगली उठाए, और प्रतीक्षारत सेवकगण को माथा फोड़ने का मौका मिल जाए, की बेसब्री से प्रतीक्षा सबके मानस पर घाव कर गई हैं।
सबने अपने ईश्वर को इंसानियत से कई गुणा ऊपर विराजित कर रखा है। उसे विश्वास का नाम देकर, असल विश्वास को गहरी खाई में धकेल दिया हैं।
राजनीति के चोचलों से लेकर तपस्या भंग के पव्वे तक का खेल, इन्हीं पदचिन्हों से गुजर रहा है। सब एक धोखे का शिकार बन चुके है, जिसे इंसान ने इंसान को सिखाया है। और आगे भी सीखाने में अंधाधुंध लगा पड़ा है। मानव अपना असल उद्देश्य भूलकर, भ्रम की दुनिया में इतना 'सुन' हो चुका है, कि उसे लहूलुहान सच की चीखें तक सुनाई नहीं दे रही है।
यह जिस तरह का खेल फ़िलहाल चल रहा है, उसे देखते हुए पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं, कि मानव अपना अस्तित्व जल्द ही खो देगा। बस बची रह जाएगी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे की भव्य दीवारें। जिन पर कुत्ते मूत रहे होंगे।

(पत्ती से पत्थर की ओर गमन)

Friday, January 3, 2020

भोपियों का प्रोपेगैंडा

सुबह स्कूल की घंटी बजती है। सभी बच्चे स्कूल की ओर चल पड़ते हैं। कुछ ने तेज रफ्तार पकड़ी हुई है, तो कुछ नन्हे कदम पीछे-पीछे भाग रहे हैं। अधिकतर लड़के लड़कियों के कदमों का पीछा करते हुए चल रहे हैं। तो कुछ इन्हें दूर से घूरते हुए चल रहे हैं। चार-पांच लड़को का एक समूह तो नियमों को दरकिनार रखते हुए, पीछे की तरफ चाहरदीवारी को लांघते हुए स्कूल में एंट्री कर रहा है।
किन्तु इन सबके बीच आज झबरा कहीं नहीं दिख रहा था। पहले तो मन में आया कि वह हमेशा की तरह आज भी लेट हो गया होगा, परन्तु अन्ततः वह कहीं नज़र नहीं आया। "झबरा"- जो कि तीसरी कक्षा का छात्र है। और वह हमेशा अकेला, अपनी ही धुन में खोया हुआ, सबसे अंतिम पंक्ति में विद्यालय जाता है। वह प्रार्थना खत्म होने के पश्चात हमेशा चाहरदीवारी को लांघकर, अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर जाते हुए छात्रों के झुण्ड में, नमक की तरह घुल जाता था। और सज़ा से बच जाता था। यह उसका डैली रूटीन बन गया था। पिछले साल उसने मात्र तीन प्रार्थना-सभा ही अटेंड की थी।
हाँ, कभी-कभार वह पकड़ा जाता था, और बहाना न बन पाने पर उसकी पीटाई भी होती थी। उसके पिताजी ने भी अध्यापकों को पीटने की पूर्ण छूट दे रखी थी। कभी-कभी तो वह बिना गलती के भी सज़ा का शिकार बन जाता था। जिस कारण से उसके सभी सहपाठी, उसे चिढ़ाते रहते थे। इसलिए वह सबसे अलग एक कोने में ही बैठता था। किसी से कुछ बात नहीं करता था।
आज वह स्कूल जाता कहीं नज़र नहीं आया, तो पूछने पर पता चला कि कल रात उसे बुखार आ गया है। और उसके माता-पिता इसे (बुखार को) किसी दैवीयशक्ति का प्रकोप बताते हुए, आज उसे गांव की ही एक भोपी को दिखाने (पूछने) हेतु ले गए है। "भोपी", जो कि स्वयं पिछले डेढ़ साल से बीमार है, किन्तु अन्य किसी की भी समस्या का तुरंत समाधान करने का दावा करती रहती है। और वह स्वयं को साक्षात दर्शन दिए हुए, अपनी आराध्य देवी की प्रतिनिधि मानती है। लोग उसे काफ़ी हद तक सच्चा मानते हैं।
आज भी भोपी को बुखार के बारे में बताए जाने पर वह अपनी आराध्य देवी के मन्दिर में से गेंहू के दस-बारह दाने (आखा) लेकर, आंखे बंद करते हुए मन ही मन कुछ चिंतन-मनन करने लग जाती है। फिर इन 'आखो' को हाथ में इधर-उधर टटोलते हुए, वह झबरे के परिवार को आने वाली अगली शुक्ल पंचमी को ग्यारह रुपये की प्रसाद, इस मन्दिर में चढ़ाने को बताती है। सभी हाथ जोड़कर 'हाँ' में गर्दन झुकाते हैं।


फिर वह बताती है, कि आज रात को एक किलोग्राम गेंहू के दलिए का हलवा तथा दो बाजरे की रोटी तेल में भिगोकर व साथ में दो-दो स्पून नमक-मिर्च लेकर, इसे (भोज्य व्यंजन) झबरे को आंगन के मध्य भाग में बिठाकर उसके सिर पर सात बार घुमाते हुए, बिना पीछे मुड़े हुए घर से करीबन तीन-सौ मीटर दूर एक निश्चित व सुनसान जाल के वृक्ष में फैंकने को कहती हैं। और वह बताती है, कि इस प्रकार देवी-शक्ति के प्रभाव से भूत-प्रेत की आत्मा (जो कि झबरे में बुखार के रूप में प्रविष्ट हुई है) उस भोज्य सामग्री के पीछे-२ चली जाएगी। तथा वह आज ही पूर्णतः स्वस्थ हो जाएगा।
और वह एक पूर्व में बना-बनाया हुआ "मादळिया" (जो कि चांदी का है तथा जिसकी बाज़ार कीमत सौ रुपये हैं) झबरे के गले में बांध देती है। और दावा करती है कि इसे पहने रखने पर भूत-प्रेत की आत्मा पुनः झबरे के शरीर में कभी नहीं प्रविष्ट कर पाएगी। उसकी यह सभी बातें झबरे का पूरा परिवार हाथ जोड़कर ध्यान से सुन रहा था। और फिर झबरे के पिताजी चार सौ रुपये भेंट स्वरूप भोपी को, तथा सौ रुपये उस मंदिर के कलश में डालते हुए, दोनों हाथ जोड़कर वहां से विदा होने की आज्ञा लेते है। फिर सभी वहां से हंसी-खुशी पुनः घर को लौट जाते हैं।
दिन ढ़ल जाने के पश्चात सम्पूर्ण व्यंजन सामग्री तैयार कर, पूरी प्रक्रिया भोपी के कहे अनुसार दोहराई जाती हैं। झबरा सुबह से ही इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को एक अनजान की तरह इधर-उधर सबकी आंखों में झांकते हुए, चुपचाप देखता रहता है। और कुछ नहीं बोलता है। किन्तु झबरे के शरीर का तापमान भोपी के कहे अनुसार अब भी घटने की बजाय ओर अधिक बढ़ता ही जा रहा था। और रात ढ़लने के साथ-२ ओर तेज होता गया। इससे उसके माता-पिता रात-भर परेशान रहे और पलक तक नहीं झपकी।
सुबह होते ही झबरे के पिताजी पुनः उस भोपी के पास जाते है। तथा बुखार नहीं उतरने का दुख सुनाते हैं। भोपी मंदिर में से कुछ 'आखे' लेकर, उन्हें कुछ समय तक हाथ में इधर-उधर हिलाकर देखती हुई कहती है, कि अब आगे उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। उसे इस समय अपनी आराध्य दैवी-शक्ति का कोई आदेश नहीं मिल रहा है। इसलिए वह फिलहाल कोई सहायता नहीं कर पाएगी। अगर कोई दैवीय-शक्ति आदेश हुआ तो वह यह आज्ञा घर बैठे ही फ़ोन पर बता देगी।
झबरे के पिताजी द्वारा अन्य कोई सुझाव पूछे जाने पर, वह(भोपी) झबरे के परिवार को गांव से बारह किलोमीटर दूर एक अन्य भोपी से मिलने की सलाह देती है। और बताती है, कि वह भोपी आपकी तुरंत सहायता कर देगी। यह नई वाली भोपी इस पूरे क्षेत्र की जानी-मानी भोपी है। जिसे सभी "भोपी-माँ" के नाम से जानते हैं।


झबरे के पिताजी अब बारह किलोमीटर दूर इस भोपी से पूछने हेतु छः सौ रुपये देकर, गाड़ी किराए पर लाते है। और सपरिवार भोपी से मिलने हेतु निकलते हैं। झबरे के माता-पिता, इस 'भोपी-माँ' के परिवार हेतु तीन किलोग्राम केले व दो चॉकलेट्स के पैकेट, भेंट स्वरूप खरीदते हैं। भोपी के घर पहुंचने पर वे पाते है, कि वहां पर पहले से ही चार-पांच दूर-दराज से यात्रीगण, अपनी-२ समस्याएं निपटाने हेतु आए हुए हैं। उन सबको भोपी द्वारा वहां से फ्री करने के बाद, झबरे के परिवार का नम्बर लगता हैं। झबरे की माताजी भोपी को फल व चॉकलेट भेंट करते हुए सम्पूर्ण घटना का विवरण सुनाती है। ततपश्चात भोपी मंदिर में से दो चुटकी 'आखे' लेती है, तथा उन्हें हाथ में इधर-उधर टटोलते हुए धूणने (वाइब्रेट मॉड में आना) लग जाती है। तथा झबरे के इस बुखार का दोष, दैवीय-शक्ति प्रकोप बताती है। तथा इस विपत्ति से छुटकारे के लिए अगले महीने की पूर्णिमा को झबरे के ननिहाल में स्थित देवी के मंदिर में बकरे की बलि चढ़ाने को कहती है। तथा साथ में इक्यावन रुपये की प्रसाद व एक स्वरूप नारियल चढ़ाने को कहती है। झबरे का परिवार हाथ जोड़कर, आज्ञा के पालन का भरोसा दिलाता हैं। फिर एक अन्य औरत आकर मुट्ठी भर गेंहू के दाने, भोपी के सिर पर छिड़कती है। जिससे भोपी का कम्पन(वाइब्रेट) मॉड तुरंत ऑफ हो जाता है। अर्थात वह धूणना बन्द कर देती है।
और फिर वह भोपी मन्दिर के अगरबत्तियों की राख (जिसे खाक कहते हैं), चुटकी में लेकर झबरे के मुंह में देती हुई, इसे निगलने को कहती है। वह झबरे की माताजी को बताती है, कि इससे झबरे का बुखार आज ही पूर्णतः ठीक हो जाएगा। बस आप समय-समय पर मेरी यानी देवी की आज्ञा का पालन करती जाएं, जिससे आपके परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। फिर झबरे की माताजी भोपी के पैर छूते हुए, सौ रुपये नासका के रूप में भोपी के हाथ में थमा देती है। तथा उनकी सारी बातें मानने का वचन देती हैं।
और पूरा परिवार मन्दिर के सामने हाथ जोड़ते हुए, वहाँ से विदा होने की भोपी से आज्ञा लेता हैं। विदा होते-होते, झबरे के पिताजी अपनी पत्नी के कहने पर मन्दिर के कलश में दो सौ रुपये भेंट स्वरूप चढ़ा देते है। और भोपी के कहने पर भोपी के नम्बर भी भोपी के पति से ले लेते है। पूरा परिवार लौटते समय, बीच रास्ते गाड़ी में भोपी के ही गुणगान गाए जा रहा था, कि ऐसी दयालू और मददगार औरत आज के दौर में कम ही मिलती हैं। किंतु झबरे का बुखार अब भी कम होने की बजाय ओर बढ़ता ही जा रहा था। घर पहुंचते ही झबरे को उल्टियाँ होनी शुरू हो जाती है।


और रात होते-होते बुखार व उल्टियाँ ओर तेज होती गई। गुजरते वक्त संग बुखार के इस प्रकार ओर तेज होते जाने से झबरे के माता-पिता की परेशानियाँ भी बढ़ती गई। अन्ततः मध्यरात्रि को झबरे के पिताजी पुनः गाड़ी किराए पर लाए तथा पूर्व में पत्नी के कहने पर, फिर आपसी सहमति से झबरे को लेकर भोपी के पास जाने लगे।
झबरे की माताजी ने बीच रास्ते भोपी को फ़ोन किया, किन्तु भोपी ने फ़ोन अटेंड नहीं किया। तो गाड़ी के ड्राइवर ने झबरे के पिताजी को बताया, कि अभी भोपी सो रही होगी। वैसे भी वह रात्रि में कोई जवाब नहीं देगी। अभी एक बार हॉस्पिटल चलते है, फिर भी यदि झबरा ठीक नहीं हुआ, तो सुबह होते ही भोपी के पास चलेंगे। इस बात पर झबरे के पिताजी ने तो 'हाँ' में इशारा किया, किन्तु झबरे की माताजी उनके इस निर्णय से खुश नहीं थी। उनका कहना था कि बिना भोपी की आज्ञा लिए हॉस्पिटल जाने से भोपी-माँ और दैवीय शक्ति दोनों नाराज होगीं तथा घर-परिवार के अन्य सदस्यों को भी उनके प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। किन्तु झबरे के पिताजी, सब अनसुना करते हुए गाड़ी के ड्राइवर की बात को प्राथमिकता देते है और हॉस्पिटल चले जाते हैं।
डॉक्टर ने झबरे का चेक-अप किया तथा मलेरिया बुखार बताया। उसने झबरे को तीन बिस्किट के साथ एक टैब्लेट तथा दो ग्लूकोज की बोतल में चार इंजेक्शन दिए। जिससे झबरे की तबियत में सुधार होने लगा। डॉक्टर ने तीन दिन का रेगुलर कोर्स दिया। तथा तीन दिन तक नियमित चेक-अप की सलाह दी। सुबह होते-होते झबरे का बुखार कम पड़ गया। यह देखकर झबरे के माता-पिता खुश हो गए। उनकी आंखे खुशी से गीत गाने लग गई, किन्तु वे कुछ भी बोल नहीं पाए। बस एक-दूसरे को देखते हुए मन ही मन मुस्कान बिखेर रहे थे।
घर वापस लौटते समय, खुशनुमा माहौल को देखते हुए गाड़ी के ड्राइवर ने झबरे के पिताजी को उसकी स्कूल भी बदलने की सलाह दी। और उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकारने का वचन दिया। यह सुनकर झबरे की खोई मुस्कान लबों पर तैर आई। वह पूरे रास्ते एक मीठी मुस्कान के साथ गाड़ी के ड्राइवर को, एकटुक नज़रों से बस देखे जा रहा था। न-जाने क्या ढूंढ़ रहा था?...

Wednesday, January 1, 2020

अन्तिम इक्कतीस

दोस्त सिटी मार गुनगुना रहे है ट्वेंटी-ट्वेंटी।
ब्लैक डॉग की सात बोतले, अब हो गई है खाली।।

मुर्गे की बांग बोलेगी, सुबह नया साल।
जिसमें होगा संकल्पित ऊर्जा का नया संचार।।

किन्तु भूल गए नशे में धुत सारे दोस्त।
जिस की बांग पर जागना था सुबह,
उसी को रात गटक गए चारों दोस्त।।