Friday, January 10, 2020

अन्यथा, कुत्ते मूत रहे होंगे।

धर्म की आड़ में इंसानियत मर रही हैं, क्योंकि सबने अपनी आत्मा जबरदस्ती अपने-२ धार्मिक देवता, स्थल को सौंप रखी है। और उसकी रक्षा का जिम्मा अपने माथे चिपका लिया है। कब कोई धर्म पर उंगली उठाए, और प्रतीक्षारत सेवकगण को माथा फोड़ने का मौका मिल जाए, की बेसब्री से प्रतीक्षा सबके मानस पर घाव कर गई हैं।
सबने अपने ईश्वर को इंसानियत से कई गुणा ऊपर विराजित कर रखा है। उसे विश्वास का नाम देकर, असल विश्वास को गहरी खाई में धकेल दिया हैं।
राजनीति के चोचलों से लेकर तपस्या भंग के पव्वे तक का खेल, इन्हीं पदचिन्हों से गुजर रहा है। सब एक धोखे का शिकार बन चुके है, जिसे इंसान ने इंसान को सिखाया है। और आगे भी सीखाने में अंधाधुंध लगा पड़ा है। मानव अपना असल उद्देश्य भूलकर, भ्रम की दुनिया में इतना 'सुन' हो चुका है, कि उसे लहूलुहान सच की चीखें तक सुनाई नहीं दे रही है।
यह जिस तरह का खेल फ़िलहाल चल रहा है, उसे देखते हुए पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं, कि मानव अपना अस्तित्व जल्द ही खो देगा। बस बची रह जाएगी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे की भव्य दीवारें। जिन पर कुत्ते मूत रहे होंगे।

(पत्ती से पत्थर की ओर गमन)

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