मिट्टी से बने इस ढाँचे को "कोठा" कहते है। इसके अलावा इसे रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर व फ़ूड लॉकर के उपनाम से भी जाना जाता हैं।
पुराणे जमाने में इसे "रेगिस्तानी लॉकर" के नाम से जाना जाता था। क्योंकि इसी में ही घी, मक्खन, रोटी, सब्जी, दूध, दही व अन्य उपयोगी खाद्य वस्तुओं को कौए, बिल्ली, छिपकली व अन्य सूक्षम विषैले जीवों से बचाकर सुरक्षित रखा जाता था। इसमें संग्रहित की गई वस्तुएं जैसे घी, मक्खन व इनसे निर्मित नास्ता, कई महीनों तक खराब नहीं होता था। जिस कारण इसे "रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर" के नाम से भी जाना जाता था।
इसके निर्माण में खड़ीन-खेत की चिकनी-मिट्टी के साथ घोड़े की लीड मिलाकर, छोटी-छोटी लुग्दियाँ तैयार की जाती हैं। फिर इस लुग्दी से धीरे-२, सम्पूर्ण सरंचना को रूप दिया जाता है। फिर इस कोठे पर ब़ील, कँगूरे तथा छोटे-२ गोल-तिकोने काँच के टुकड़े चिपकाकर, इसकी सुंदरता को ओर निखारा जाता हैं।
और पास में ही लकड़ियों के बंडल्स को रखने के लिए, कोठे से सटी हुई एक पागे(पैर) की ईंधणियाळी बनाई जाती है।
आज यह रेफ्रिजरेटर अपने अंतिम छोर पर है। आज के दौर में 'मिट्टी के इस कोठे' का स्थान इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर व वुड-मेड कठान्तरे ने ले लिया हैं।
पुराणे जमाने में इसे "रेगिस्तानी लॉकर" के नाम से जाना जाता था। क्योंकि इसी में ही घी, मक्खन, रोटी, सब्जी, दूध, दही व अन्य उपयोगी खाद्य वस्तुओं को कौए, बिल्ली, छिपकली व अन्य सूक्षम विषैले जीवों से बचाकर सुरक्षित रखा जाता था। इसमें संग्रहित की गई वस्तुएं जैसे घी, मक्खन व इनसे निर्मित नास्ता, कई महीनों तक खराब नहीं होता था। जिस कारण इसे "रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर" के नाम से भी जाना जाता था।
इसके निर्माण में खड़ीन-खेत की चिकनी-मिट्टी के साथ घोड़े की लीड मिलाकर, छोटी-छोटी लुग्दियाँ तैयार की जाती हैं। फिर इस लुग्दी से धीरे-२, सम्पूर्ण सरंचना को रूप दिया जाता है। फिर इस कोठे पर ब़ील, कँगूरे तथा छोटे-२ गोल-तिकोने काँच के टुकड़े चिपकाकर, इसकी सुंदरता को ओर निखारा जाता हैं।
और पास में ही लकड़ियों के बंडल्स को रखने के लिए, कोठे से सटी हुई एक पागे(पैर) की ईंधणियाळी बनाई जाती है।
आज यह रेफ्रिजरेटर अपने अंतिम छोर पर है। आज के दौर में 'मिट्टी के इस कोठे' का स्थान इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर व वुड-मेड कठान्तरे ने ले लिया हैं।
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| Photo : Mool Singh Rathore |






