Sunday, May 19, 2019

रेगिस्तानी लॉकर या रेफ्रिजरेटर

मिट्टी से बने इस ढाँचे को "कोठा" कहते है। इसके अलावा इसे रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर व फ़ूड लॉकर के उपनाम से भी जाना जाता हैं।
पुराणे जमाने में इसे "रेगिस्तानी लॉकर" के नाम से जाना जाता था। क्योंकि इसी में ही घी, मक्खन, रोटी, सब्जी, दूध, दही व अन्य उपयोगी खाद्य वस्तुओं को कौए, बिल्ली, छिपकली व अन्य सूक्षम विषैले जीवों से बचाकर सुरक्षित रखा जाता था। इसमें संग्रहित की गई वस्तुएं जैसे घी, मक्खन व इनसे निर्मित नास्ता, कई महीनों तक खराब नहीं होता था। जिस कारण इसे "रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर" के नाम से भी जाना जाता था।
इसके निर्माण में खड़ीन-खेत की चिकनी-मिट्टी के साथ घोड़े की लीड मिलाकर, छोटी-छोटी लुग्दियाँ तैयार की जाती हैं। फिर इस लुग्दी से धीरे-२, सम्पूर्ण सरंचना को रूप दिया जाता है। फिर इस कोठे पर ब़ील, कँगूरे तथा छोटे-२ गोल-तिकोने काँच के टुकड़े चिपकाकर, इसकी सुंदरता को ओर निखारा जाता हैं।
और पास में ही लकड़ियों के बंडल्स को रखने के लिए, कोठे से सटी हुई एक पागे(पैर) की ईंधणियाळी बनाई जाती है।
आज यह रेफ्रिजरेटर अपने अंतिम छोर पर है। आज के दौर में 'मिट्टी के इस कोठे' का स्थान इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर व वुड-मेड कठान्तरे ने ले लिया हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Monday, May 6, 2019

पीलू खाती धोरा धरती

मई-जून के दिन
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रेगिस्थान में मई-जून के महीने अपने संग लाते है, झुलसते गर्म दिन। मानो पारे ने तो कसम खा रखी हो, 45℃ से नीचे उतरना ही नहीं है। मई महीने के प्रारम्भिक हफ़्ते, रेत की आँधियों के शुरुआती दिन कहे जाते हैं। इन दिनों रेत से सनी हुई गर्म आँधियां, शुष्क वातावरण में चारों तरफ तैरती रहती हैं।
बावजूद इसके, रेगिस्तान का शुष्क वातावरण इन दिनों कैर-सांगरी,पीलू-कोकड़, पाका-खोखा जैसे अमूल्य मीठे फल व खाद्य व्यजंन प्रकृति-प्रदत करता है।
रेगिस्थानी इन दिनों, कैर-सांगरी की सब्जी खाने के शौकीन बन जाते हैं। बच्चे पूरा दिन झुलसती दोपहर में कैर व सांगरी चुगने में व्यस्त दिखते हैं। इन दिनों लगभग सभी घरों में यह सब्जी देखी जा सकती हैं। यहाँ तक कि पांच सौ किलोमीटर दूर से पधारे अध्यापकजी भी, अब इन सब्जियों के आदी बन चुके हैं। और इन दिनों बच्चों को ज्यादा मार्क्स देने लगते हैं।
सांगरी के विषय में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि इसे उबालकर और सुखाकर भविष्य में लम्बे समय के लिए आसानी से परिरक्षित किया जा सकता है।
कैर सांगरी चुगने से थोड़ी फुरसत मिली ही नहीं, कि बच्चों की मण्डली कमर में लौटा लटकाए हुए, साथ में बाल्टी, मग, चऊड़ी या ताम्बेड़िया लेकर जाळियों के झुंड में पूरा दिन भूखे-प्यासे, पीलू चुगने निकल जाती हैं। बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियां घर की चारदीवारी में कम और जाळियों पर लटकते हुए अधिक बिताते हैं। और सभी सांझ ढ़ले, पीलूओं से भरे बर्तनों के साथ हँसी-खुशी घर लौटते हैं।
अधिक संख्या में पीलू होने पर, इन्हें सुखाकर कोकड़ बनाई जाती हैं, जो कि रस-भरे पीलूओं का निर्जलीकृत रूप होता हैं। पीलू के प्रति अपार प्रेम को दर्शाती, रेगिस्थानी लघु दन्त-कथा का संक्षिप्त सारांश इस प्रकार हैं-
रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळियां रो ढ़िग।।
और इन बच्चों से थोड़ी कम उम्र के बच्चे, इन दिनों नीम की निम्बोळी से जेबें भरने में व्यस्त दिखाई देते हैं।
और अपने जीवनकाल की एक तिहाई उम्र पार कर चुका साफ़ाधारी वर्ग, अपना पूरा समय कोटड़ी में तास के पतों संग सूत कातने में बिताता है।
दिन ढ़लने के साथ-साथ लू की मार कम पड़ने लगती हैं। पारा कसम तोड़ने लगता हैं। रातें ठण्डी होने लगती हैं। और खुल्ला आसमान, तारों की रौशनी से जगमगाने लगता हैं। इन दिनों केवल रातें ही सुकून के सुरीले गीत गाती है, दिन तो खटारा गाड़ी पर सवार शहर लगते है।
(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)

(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)



Saturday, May 4, 2019

आखातीज या आखात्री पर्व

आखातीज, जिसे रेगिस्थान का अपना त्योहार माना जाता हैं। इस रेगिस्थानी पर्व की शुरुआत अक्षय तृतीया से लगभग पन्द्रह-बीस दिन पूर्व ही हो जाती हैं। बच्चों की मण्डली प्रातः जल्दी उठकर, बैलों के गले में बाँधी जाने वाली घण्टियों को लेकर, जोर-जोर से बजाती हुई सभी को सचेत करती हैं। और फिर वे सभी लकड़ी के बनाए हुए छोटे-छोटे हळो से रात भर सूखे धोरों पर, एक खेत की तरह हळ जोतते रहते हैं। और अपनी हरियल भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सभी बच्चे हल जोतते समय एक साथ, एक लय-ताल में गीत गाते रहते हैं-
आकड़े रो हळियो, नीम्बड़े री नाइ।
रमते-झुमते, बाजरकी ब़ाइ....।।
हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते रहते और बातें करते रहते। बच्चों की यह रोजमर्रा प्रक्रिया आखातीज तक सतत चलती रहती हैं।
आखातीज का त्योहार मुख्यतः तीन दिन चलता है। प्रथम दिन आँगन के चौक में बनी रंगोली पर अनाज के पांच छोटे-छोटे ढेर बनाए जाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रखी जाती हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखा जाता हैं। बच्चे सुबह जल्दी स्नान करके, रूमाल में गुड़ व आखा लेकर, गले में बैलों की घण्टियाँ लटकाकर, हळ जोतने धोरे पर इकट्ठा हो जाते हैं। वे हंसते-खेलते एक-दूसरे को गुड़ की मनुहारे करते हैं। तथा आने-जाने वाले ग्रामीणों को पौटली में से आखा देकर, उनका स्वागत सत्कार गुड़ खिलाकर करते हैं। और ग्रामीण भी बच्चों को सकारात्मक रवैये से इस बार अच्छी बारिश होने के सगुन बताकर उन्हें खुश करते हैं।
ग्रामीण अपनी-अपनी कोटड़ी के आँगन में अनाज के पांच छोटे-छोटे ढ़ेर बनाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रख देते हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखते हैं। और फिर सभी जनसामान्य कोटड़ी में चल रही रियाण में इकट्ठा होकर, एक-दूसरे को पर्व की बधाइयाँ देते हैं। इस दिन आगामी मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता हैं। तथा इस वर्ष सुकाळ रहेगा या अकाळ?, इसके सगुन एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। रियाण में अफीम गलाकर एक-दूसरे को मुट्ठी-भर पिलाने की मनुहारे करते हैं। इस दिन सभी विरोधी गिले-शिकवे व बेर भूलकर एक ही जाजम पर बैठते हैं। कोटड़ी में चल रही रियाण के लिए सभी घरों से खीच भरी थालियाँ व अन्य व्यंजन आते हैं। जिसे यहाँ की भाषा में तासळा कहते हैं। और फिर सभी बाजरे के खीच के साथ घी-गुड़, दही या कढ़ी लेकर एक-साथ बैठ भोजन करते हैं। फिर वे सभी एक साथ दूसरी कोटड़ी पधारते हैं, उनकी मनुहार, सगुन-परख व भोज-सत्कार मिळझुलकर साझा करते हैं। मांगणियार इस शुभ अवसर पर मनुहार व हर्षोल्लास के सुरीले गीत गाते हैं। कुछ समय पश्चात बच्चों की मण्डली जोर जोर से घण्टियाँ बजाती हुई, गांव की सभी कोटड़ियों में पधारती हैं, सभी हंसी-खुशी उनका स्वागत करते हैं, उन्हें बाजरे के खीच संग घी-गुड़, दही व कढ़ी भरपेट खिलाते हैं। इस दिन मुख्यतः सभी घरों में बाजरे का खीच ही बनाया जाता हैं। खीच बनाने के लिए एक दिन पूर्व, भीगे बाजरे को घर के आंगन में धंसी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता हैं। फिर इस कूटे हुए बाजरे को सुखा दिया जाता हैं। और अगले दिन पकाया जाता हैं।
पर्व का दूसरा दिन यानी दूज, भी हू-बहू प्रथम दिन(अमावस्या) की तरह ही मनाया जाता है।
पर्व का तीसरा व आखरी दिन अक्षय तृतीया, भी हू-बहू दोनों दिनों की तरह ही मनाया जाता हैं, किन्तु इस दिन मेहमानों को भोजन में बाजरे के खीच के स्थान पर गुळराब, घी-गुड़ में तैरते गेंहू के फाफरिये, कैर-सांगरी व ग्वारफळी की सब्जी के साथ-साथ दही-छाछ परोसी जाती हैं।
आज चीज़े बदलने लग गयी हैं। बुजूर्ग आधुनिक आखातीज के परिपेक्ष में व्यथा सुनाते हैं, कि "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच व घी से भरी रहती थी, किन्तु आज थालियाँ छोटी हो गयी हैं और खीच उससे भी कम"। पहले पूरी रात हल जोते जाते थे। रात भर बळधिया बनकर जोर-जोर से घण्टियाँ बजाते थे। किंतु आज के बच्चे अब अक्षय तृतीया को ही दिखते हैं। बड़ी वाली घण्टियाँ तो इन्होंने देखी ही नहीं हैं। आज आखातीज का यह त्योहार धीरे-धीरे सिकुड़ रहा हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore