आकड़े रो हळियो, नीम्बड़े री नाइ।
रमते-झुमते, बाजरकी ब़ाइ....।।
हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते रहते और बातें करते रहते। बच्चों की यह रोजमर्रा प्रक्रिया आखातीज तक सतत चलती रहती हैं।
आखातीज का त्योहार मुख्यतः तीन दिन चलता है। प्रथम दिन आँगन के चौक में बनी रंगोली पर अनाज के पांच छोटे-छोटे ढेर बनाए जाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रखी जाती हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखा जाता हैं। बच्चे सुबह जल्दी स्नान करके, रूमाल में गुड़ व आखा लेकर, गले में बैलों की घण्टियाँ लटकाकर, हळ जोतने धोरे पर इकट्ठा हो जाते हैं। वे हंसते-खेलते एक-दूसरे को गुड़ की मनुहारे करते हैं। तथा आने-जाने वाले ग्रामीणों को पौटली में से आखा देकर, उनका स्वागत सत्कार गुड़ खिलाकर करते हैं। और ग्रामीण भी बच्चों को सकारात्मक रवैये से इस बार अच्छी बारिश होने के सगुन बताकर उन्हें खुश करते हैं।
ग्रामीण अपनी-अपनी कोटड़ी के आँगन में अनाज के पांच छोटे-छोटे ढ़ेर बनाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रख देते हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखते हैं। और फिर सभी जनसामान्य कोटड़ी में चल रही रियाण में इकट्ठा होकर, एक-दूसरे को पर्व की बधाइयाँ देते हैं। इस दिन आगामी मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता हैं। तथा इस वर्ष सुकाळ रहेगा या अकाळ?, इसके सगुन एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। रियाण में अफीम गलाकर एक-दूसरे को मुट्ठी-भर पिलाने की मनुहारे करते हैं। इस दिन सभी विरोधी गिले-शिकवे व बेर भूलकर एक ही जाजम पर बैठते हैं। कोटड़ी में चल रही रियाण के लिए सभी घरों से खीच भरी थालियाँ व अन्य व्यंजन आते हैं। जिसे यहाँ की भाषा में तासळा कहते हैं। और फिर सभी बाजरे के खीच के साथ घी-गुड़, दही या कढ़ी लेकर एक-साथ बैठ भोजन करते हैं। फिर वे सभी एक साथ दूसरी कोटड़ी पधारते हैं, उनकी मनुहार, सगुन-परख व भोज-सत्कार मिळझुलकर साझा करते हैं। मांगणियार इस शुभ अवसर पर मनुहार व हर्षोल्लास के सुरीले गीत गाते हैं। कुछ समय पश्चात बच्चों की मण्डली जोर जोर से घण्टियाँ बजाती हुई, गांव की सभी कोटड़ियों में पधारती हैं, सभी हंसी-खुशी उनका स्वागत करते हैं, उन्हें बाजरे के खीच संग घी-गुड़, दही व कढ़ी भरपेट खिलाते हैं। इस दिन मुख्यतः सभी घरों में बाजरे का खीच ही बनाया जाता हैं। खीच बनाने के लिए एक दिन पूर्व, भीगे बाजरे को घर के आंगन में धंसी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता हैं। फिर इस कूटे हुए बाजरे को सुखा दिया जाता हैं। और अगले दिन पकाया जाता हैं।
पर्व का दूसरा दिन यानी दूज, भी हू-बहू प्रथम दिन(अमावस्या) की तरह ही मनाया जाता है।
पर्व का तीसरा व आखरी दिन अक्षय तृतीया, भी हू-बहू दोनों दिनों की तरह ही मनाया जाता हैं, किन्तु इस दिन मेहमानों को भोजन में बाजरे के खीच के स्थान पर गुळराब, घी-गुड़ में तैरते गेंहू के फाफरिये, कैर-सांगरी व ग्वारफळी की सब्जी के साथ-साथ दही-छाछ परोसी जाती हैं।
आज चीज़े बदलने लग गयी हैं। बुजूर्ग आधुनिक आखातीज के परिपेक्ष में व्यथा सुनाते हैं, कि "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच व घी से भरी रहती थी, किन्तु आज थालियाँ छोटी हो गयी हैं और खीच उससे भी कम"। पहले पूरी रात हल जोते जाते थे। रात भर बळधिया बनकर जोर-जोर से घण्टियाँ बजाते थे। किंतु आज के बच्चे अब अक्षय तृतीया को ही दिखते हैं। बड़ी वाली घण्टियाँ तो इन्होंने देखी ही नहीं हैं। आज आखातीज का यह त्योहार धीरे-धीरे सिकुड़ रहा हैं।
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| Photo : Mool Singh Rathore |
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| Photo : Mool Singh Rathore |
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| Photo : Mool Singh Rathore |




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