Tuesday, December 15, 2020

झाँकती साँझ

 साँझ के सङ्गी घर लौट रहे,

मैं दरकिनार बैठा दरिया हूँ।


मेरा नीर नदी ले गई,

अब मात्र बुझता ज़रिया हूँ।


जग सङ्ग रंग ख्वाब उलझाए,

यह राज क्यों जान रहा हूँ।


मैं तो कल ही बुझ चुका था,

फिर आज क्यों जाग रहा हूँ?

भरी साँझ क्यों झांक रहा हूँ?

~ (०२-०९-२०२०)


No comments:

Post a Comment