Friday, January 3, 2020

भोपियों का प्रोपेगैंडा

सुबह स्कूल की घंटी बजती है। सभी बच्चे स्कूल की ओर चल पड़ते हैं। कुछ ने तेज रफ्तार पकड़ी हुई है, तो कुछ नन्हे कदम पीछे-पीछे भाग रहे हैं। अधिकतर लड़के लड़कियों के कदमों का पीछा करते हुए चल रहे हैं। तो कुछ इन्हें दूर से घूरते हुए चल रहे हैं। चार-पांच लड़को का एक समूह तो नियमों को दरकिनार रखते हुए, पीछे की तरफ चाहरदीवारी को लांघते हुए स्कूल में एंट्री कर रहा है।
किन्तु इन सबके बीच आज झबरा कहीं नहीं दिख रहा था। पहले तो मन में आया कि वह हमेशा की तरह आज भी लेट हो गया होगा, परन्तु अन्ततः वह कहीं नज़र नहीं आया। "झबरा"- जो कि तीसरी कक्षा का छात्र है। और वह हमेशा अकेला, अपनी ही धुन में खोया हुआ, सबसे अंतिम पंक्ति में विद्यालय जाता है। वह प्रार्थना खत्म होने के पश्चात हमेशा चाहरदीवारी को लांघकर, अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर जाते हुए छात्रों के झुण्ड में, नमक की तरह घुल जाता था। और सज़ा से बच जाता था। यह उसका डैली रूटीन बन गया था। पिछले साल उसने मात्र तीन प्रार्थना-सभा ही अटेंड की थी।
हाँ, कभी-कभार वह पकड़ा जाता था, और बहाना न बन पाने पर उसकी पीटाई भी होती थी। उसके पिताजी ने भी अध्यापकों को पीटने की पूर्ण छूट दे रखी थी। कभी-कभी तो वह बिना गलती के भी सज़ा का शिकार बन जाता था। जिस कारण से उसके सभी सहपाठी, उसे चिढ़ाते रहते थे। इसलिए वह सबसे अलग एक कोने में ही बैठता था। किसी से कुछ बात नहीं करता था।
आज वह स्कूल जाता कहीं नज़र नहीं आया, तो पूछने पर पता चला कि कल रात उसे बुखार आ गया है। और उसके माता-पिता इसे (बुखार को) किसी दैवीयशक्ति का प्रकोप बताते हुए, आज उसे गांव की ही एक भोपी को दिखाने (पूछने) हेतु ले गए है। "भोपी", जो कि स्वयं पिछले डेढ़ साल से बीमार है, किन्तु अन्य किसी की भी समस्या का तुरंत समाधान करने का दावा करती रहती है। और वह स्वयं को साक्षात दर्शन दिए हुए, अपनी आराध्य देवी की प्रतिनिधि मानती है। लोग उसे काफ़ी हद तक सच्चा मानते हैं।
आज भी भोपी को बुखार के बारे में बताए जाने पर वह अपनी आराध्य देवी के मन्दिर में से गेंहू के दस-बारह दाने (आखा) लेकर, आंखे बंद करते हुए मन ही मन कुछ चिंतन-मनन करने लग जाती है। फिर इन 'आखो' को हाथ में इधर-उधर टटोलते हुए, वह झबरे के परिवार को आने वाली अगली शुक्ल पंचमी को ग्यारह रुपये की प्रसाद, इस मन्दिर में चढ़ाने को बताती है। सभी हाथ जोड़कर 'हाँ' में गर्दन झुकाते हैं।


फिर वह बताती है, कि आज रात को एक किलोग्राम गेंहू के दलिए का हलवा तथा दो बाजरे की रोटी तेल में भिगोकर व साथ में दो-दो स्पून नमक-मिर्च लेकर, इसे (भोज्य व्यंजन) झबरे को आंगन के मध्य भाग में बिठाकर उसके सिर पर सात बार घुमाते हुए, बिना पीछे मुड़े हुए घर से करीबन तीन-सौ मीटर दूर एक निश्चित व सुनसान जाल के वृक्ष में फैंकने को कहती हैं। और वह बताती है, कि इस प्रकार देवी-शक्ति के प्रभाव से भूत-प्रेत की आत्मा (जो कि झबरे में बुखार के रूप में प्रविष्ट हुई है) उस भोज्य सामग्री के पीछे-२ चली जाएगी। तथा वह आज ही पूर्णतः स्वस्थ हो जाएगा।
और वह एक पूर्व में बना-बनाया हुआ "मादळिया" (जो कि चांदी का है तथा जिसकी बाज़ार कीमत सौ रुपये हैं) झबरे के गले में बांध देती है। और दावा करती है कि इसे पहने रखने पर भूत-प्रेत की आत्मा पुनः झबरे के शरीर में कभी नहीं प्रविष्ट कर पाएगी। उसकी यह सभी बातें झबरे का पूरा परिवार हाथ जोड़कर ध्यान से सुन रहा था। और फिर झबरे के पिताजी चार सौ रुपये भेंट स्वरूप भोपी को, तथा सौ रुपये उस मंदिर के कलश में डालते हुए, दोनों हाथ जोड़कर वहां से विदा होने की आज्ञा लेते है। फिर सभी वहां से हंसी-खुशी पुनः घर को लौट जाते हैं।
दिन ढ़ल जाने के पश्चात सम्पूर्ण व्यंजन सामग्री तैयार कर, पूरी प्रक्रिया भोपी के कहे अनुसार दोहराई जाती हैं। झबरा सुबह से ही इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को एक अनजान की तरह इधर-उधर सबकी आंखों में झांकते हुए, चुपचाप देखता रहता है। और कुछ नहीं बोलता है। किन्तु झबरे के शरीर का तापमान भोपी के कहे अनुसार अब भी घटने की बजाय ओर अधिक बढ़ता ही जा रहा था। और रात ढ़लने के साथ-२ ओर तेज होता गया। इससे उसके माता-पिता रात-भर परेशान रहे और पलक तक नहीं झपकी।
सुबह होते ही झबरे के पिताजी पुनः उस भोपी के पास जाते है। तथा बुखार नहीं उतरने का दुख सुनाते हैं। भोपी मंदिर में से कुछ 'आखे' लेकर, उन्हें कुछ समय तक हाथ में इधर-उधर हिलाकर देखती हुई कहती है, कि अब आगे उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। उसे इस समय अपनी आराध्य दैवी-शक्ति का कोई आदेश नहीं मिल रहा है। इसलिए वह फिलहाल कोई सहायता नहीं कर पाएगी। अगर कोई दैवीय-शक्ति आदेश हुआ तो वह यह आज्ञा घर बैठे ही फ़ोन पर बता देगी।
झबरे के पिताजी द्वारा अन्य कोई सुझाव पूछे जाने पर, वह(भोपी) झबरे के परिवार को गांव से बारह किलोमीटर दूर एक अन्य भोपी से मिलने की सलाह देती है। और बताती है, कि वह भोपी आपकी तुरंत सहायता कर देगी। यह नई वाली भोपी इस पूरे क्षेत्र की जानी-मानी भोपी है। जिसे सभी "भोपी-माँ" के नाम से जानते हैं।


झबरे के पिताजी अब बारह किलोमीटर दूर इस भोपी से पूछने हेतु छः सौ रुपये देकर, गाड़ी किराए पर लाते है। और सपरिवार भोपी से मिलने हेतु निकलते हैं। झबरे के माता-पिता, इस 'भोपी-माँ' के परिवार हेतु तीन किलोग्राम केले व दो चॉकलेट्स के पैकेट, भेंट स्वरूप खरीदते हैं। भोपी के घर पहुंचने पर वे पाते है, कि वहां पर पहले से ही चार-पांच दूर-दराज से यात्रीगण, अपनी-२ समस्याएं निपटाने हेतु आए हुए हैं। उन सबको भोपी द्वारा वहां से फ्री करने के बाद, झबरे के परिवार का नम्बर लगता हैं। झबरे की माताजी भोपी को फल व चॉकलेट भेंट करते हुए सम्पूर्ण घटना का विवरण सुनाती है। ततपश्चात भोपी मंदिर में से दो चुटकी 'आखे' लेती है, तथा उन्हें हाथ में इधर-उधर टटोलते हुए धूणने (वाइब्रेट मॉड में आना) लग जाती है। तथा झबरे के इस बुखार का दोष, दैवीय-शक्ति प्रकोप बताती है। तथा इस विपत्ति से छुटकारे के लिए अगले महीने की पूर्णिमा को झबरे के ननिहाल में स्थित देवी के मंदिर में बकरे की बलि चढ़ाने को कहती है। तथा साथ में इक्यावन रुपये की प्रसाद व एक स्वरूप नारियल चढ़ाने को कहती है। झबरे का परिवार हाथ जोड़कर, आज्ञा के पालन का भरोसा दिलाता हैं। फिर एक अन्य औरत आकर मुट्ठी भर गेंहू के दाने, भोपी के सिर पर छिड़कती है। जिससे भोपी का कम्पन(वाइब्रेट) मॉड तुरंत ऑफ हो जाता है। अर्थात वह धूणना बन्द कर देती है।
और फिर वह भोपी मन्दिर के अगरबत्तियों की राख (जिसे खाक कहते हैं), चुटकी में लेकर झबरे के मुंह में देती हुई, इसे निगलने को कहती है। वह झबरे की माताजी को बताती है, कि इससे झबरे का बुखार आज ही पूर्णतः ठीक हो जाएगा। बस आप समय-समय पर मेरी यानी देवी की आज्ञा का पालन करती जाएं, जिससे आपके परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। फिर झबरे की माताजी भोपी के पैर छूते हुए, सौ रुपये नासका के रूप में भोपी के हाथ में थमा देती है। तथा उनकी सारी बातें मानने का वचन देती हैं।
और पूरा परिवार मन्दिर के सामने हाथ जोड़ते हुए, वहाँ से विदा होने की भोपी से आज्ञा लेता हैं। विदा होते-होते, झबरे के पिताजी अपनी पत्नी के कहने पर मन्दिर के कलश में दो सौ रुपये भेंट स्वरूप चढ़ा देते है। और भोपी के कहने पर भोपी के नम्बर भी भोपी के पति से ले लेते है। पूरा परिवार लौटते समय, बीच रास्ते गाड़ी में भोपी के ही गुणगान गाए जा रहा था, कि ऐसी दयालू और मददगार औरत आज के दौर में कम ही मिलती हैं। किंतु झबरे का बुखार अब भी कम होने की बजाय ओर बढ़ता ही जा रहा था। घर पहुंचते ही झबरे को उल्टियाँ होनी शुरू हो जाती है।


और रात होते-होते बुखार व उल्टियाँ ओर तेज होती गई। गुजरते वक्त संग बुखार के इस प्रकार ओर तेज होते जाने से झबरे के माता-पिता की परेशानियाँ भी बढ़ती गई। अन्ततः मध्यरात्रि को झबरे के पिताजी पुनः गाड़ी किराए पर लाए तथा पूर्व में पत्नी के कहने पर, फिर आपसी सहमति से झबरे को लेकर भोपी के पास जाने लगे।
झबरे की माताजी ने बीच रास्ते भोपी को फ़ोन किया, किन्तु भोपी ने फ़ोन अटेंड नहीं किया। तो गाड़ी के ड्राइवर ने झबरे के पिताजी को बताया, कि अभी भोपी सो रही होगी। वैसे भी वह रात्रि में कोई जवाब नहीं देगी। अभी एक बार हॉस्पिटल चलते है, फिर भी यदि झबरा ठीक नहीं हुआ, तो सुबह होते ही भोपी के पास चलेंगे। इस बात पर झबरे के पिताजी ने तो 'हाँ' में इशारा किया, किन्तु झबरे की माताजी उनके इस निर्णय से खुश नहीं थी। उनका कहना था कि बिना भोपी की आज्ञा लिए हॉस्पिटल जाने से भोपी-माँ और दैवीय शक्ति दोनों नाराज होगीं तथा घर-परिवार के अन्य सदस्यों को भी उनके प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। किन्तु झबरे के पिताजी, सब अनसुना करते हुए गाड़ी के ड्राइवर की बात को प्राथमिकता देते है और हॉस्पिटल चले जाते हैं।
डॉक्टर ने झबरे का चेक-अप किया तथा मलेरिया बुखार बताया। उसने झबरे को तीन बिस्किट के साथ एक टैब्लेट तथा दो ग्लूकोज की बोतल में चार इंजेक्शन दिए। जिससे झबरे की तबियत में सुधार होने लगा। डॉक्टर ने तीन दिन का रेगुलर कोर्स दिया। तथा तीन दिन तक नियमित चेक-अप की सलाह दी। सुबह होते-होते झबरे का बुखार कम पड़ गया। यह देखकर झबरे के माता-पिता खुश हो गए। उनकी आंखे खुशी से गीत गाने लग गई, किन्तु वे कुछ भी बोल नहीं पाए। बस एक-दूसरे को देखते हुए मन ही मन मुस्कान बिखेर रहे थे।
घर वापस लौटते समय, खुशनुमा माहौल को देखते हुए गाड़ी के ड्राइवर ने झबरे के पिताजी को उसकी स्कूल भी बदलने की सलाह दी। और उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकारने का वचन दिया। यह सुनकर झबरे की खोई मुस्कान लबों पर तैर आई। वह पूरे रास्ते एक मीठी मुस्कान के साथ गाड़ी के ड्राइवर को, एकटुक नज़रों से बस देखे जा रहा था। न-जाने क्या ढूंढ़ रहा था?...

Wednesday, January 1, 2020

अन्तिम इक्कतीस

दोस्त सिटी मार गुनगुना रहे है ट्वेंटी-ट्वेंटी।
ब्लैक डॉग की सात बोतले, अब हो गई है खाली।।

मुर्गे की बांग बोलेगी, सुबह नया साल।
जिसमें होगा संकल्पित ऊर्जा का नया संचार।।

किन्तु भूल गए नशे में धुत सारे दोस्त।
जिस की बांग पर जागना था सुबह,
उसी को रात गटक गए चारों दोस्त।।

Thursday, December 19, 2019

हॉस्टल लाइफ

• गोलमटोल सपनों की धुँधली दोस्त होती है हॉस्टल लाइफ
• बिन होश, जोश उगलती खरी डोर होती है हॉस्टल लाइफ
• सर्द महीनों सी उगती, छटकती धूप होती है हॉस्टल लाइफ
• सैकड़ों छुपे अरमानों को पंख बाँटती है हॉस्टल लाइफ
• सहमी सोच को बुलंद कण्ठ सौंपती है हॉस्टल लाइफ
• एक कदम पीछे सैकड़ों सिर जोड़ती है हॉस्टल लाइफ
• थाली के सातों कवे, एक साथ गटकती है हॉस्टल लाइफ
• तूं-तड़ाक से सभ्य-बोल, बुलवाती है हॉस्टल लाइफ
• बिखरे मनकों से अटूट माला बुनती है हॉस्टल लाइफ
• रूठे सपनों के नाम मंजिल ढूँढती है हॉस्टल लाइफ
• नन्हें कदमों से अजय-धावक पछाड़ती है हॉस्टल लाइफ
• "इनशॉर्ट, बालक को समाज बनाती है हॉस्टल लाइफ"



Saturday, July 27, 2019

हाउड़ो

यह रेगिस्तान में प्रयुक्त होने वाला एक विशिष्ट शब्द है। जिसका उपयोग शिशु को आवश्यक व अनावश्यक कार्यों को रोकने या करवाने हेतु प्रयुक्त किया जाता हैं।
यह शब्द शिशुओं की खुशी, जिज्ञासा, इच्छा, क्रियाशीलता, उत्सुकता व अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता हैं। हाउड़े (एक काल्पनिक, काली-डरावनी शक्ति) का डर फैलाकर, बच्चे के व्यवहारिक अधिगम की ओर बढ़ते कदमों को पीछे खींचा जाता हैं। जिससे सभी जाने-अनजाने में अनजान बनते हैं। बस अपना काम निकालने के चक्कर में, वे बच्चे के मन में उम्रभर के लिए, एक डर पैदा कर देते हैं।
शैशवावस्था में शिशु अपने माता-पिता, रिलेटिव्स, परिवार या समाज के व्यक्तियों में से हाउड़े का जिक्र जरूर सुनता हैं। और उसे सच मानता हैं, क्योंकि यह इस अवस्था की एक अनुकरण-अधिगम विशेषता हैं। और एक अनजान,अज्ञात डर का ता-उम्र के लिए शिकार हो जाता हैं। प्रायः इसी डर के शिकार की वजह से बच्चे भूत, प्रेत, आत्माओं को भी मानने लग जाते हैं। जिसका खामियाजा उन्हें पूरी उम्र चुकाना पड़ता हैं।
वास्तविकता में, हाउड़े शब्द की कोई सत्यता नहीं होती हैं। यह महज एक वहम और काल्पनिक मनोदशा होती हैं। जिसका शिकार कुपोषण से कई ज्यादा घातक होता है।

Sunday, May 19, 2019

रेगिस्तानी लॉकर या रेफ्रिजरेटर

मिट्टी से बने इस ढाँचे को "कोठा" कहते है। इसके अलावा इसे रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर व फ़ूड लॉकर के उपनाम से भी जाना जाता हैं।
पुराणे जमाने में इसे "रेगिस्तानी लॉकर" के नाम से जाना जाता था। क्योंकि इसी में ही घी, मक्खन, रोटी, सब्जी, दूध, दही व अन्य उपयोगी खाद्य वस्तुओं को कौए, बिल्ली, छिपकली व अन्य सूक्षम विषैले जीवों से बचाकर सुरक्षित रखा जाता था। इसमें संग्रहित की गई वस्तुएं जैसे घी, मक्खन व इनसे निर्मित नास्ता, कई महीनों तक खराब नहीं होता था। जिस कारण इसे "रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर" के नाम से भी जाना जाता था।
इसके निर्माण में खड़ीन-खेत की चिकनी-मिट्टी के साथ घोड़े की लीड मिलाकर, छोटी-छोटी लुग्दियाँ तैयार की जाती हैं। फिर इस लुग्दी से धीरे-२, सम्पूर्ण सरंचना को रूप दिया जाता है। फिर इस कोठे पर ब़ील, कँगूरे तथा छोटे-२ गोल-तिकोने काँच के टुकड़े चिपकाकर, इसकी सुंदरता को ओर निखारा जाता हैं।
और पास में ही लकड़ियों के बंडल्स को रखने के लिए, कोठे से सटी हुई एक पागे(पैर) की ईंधणियाळी बनाई जाती है।
आज यह रेफ्रिजरेटर अपने अंतिम छोर पर है। आज के दौर में 'मिट्टी के इस कोठे' का स्थान इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर व वुड-मेड कठान्तरे ने ले लिया हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Monday, May 6, 2019

पीलू खाती धोरा धरती

मई-जून के दिन
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रेगिस्थान में मई-जून के महीने अपने संग लाते है, झुलसते गर्म दिन। मानो पारे ने तो कसम खा रखी हो, 45℃ से नीचे उतरना ही नहीं है। मई महीने के प्रारम्भिक हफ़्ते, रेत की आँधियों के शुरुआती दिन कहे जाते हैं। इन दिनों रेत से सनी हुई गर्म आँधियां, शुष्क वातावरण में चारों तरफ तैरती रहती हैं।
बावजूद इसके, रेगिस्तान का शुष्क वातावरण इन दिनों कैर-सांगरी,पीलू-कोकड़, पाका-खोखा जैसे अमूल्य मीठे फल व खाद्य व्यजंन प्रकृति-प्रदत करता है।
रेगिस्थानी इन दिनों, कैर-सांगरी की सब्जी खाने के शौकीन बन जाते हैं। बच्चे पूरा दिन झुलसती दोपहर में कैर व सांगरी चुगने में व्यस्त दिखते हैं। इन दिनों लगभग सभी घरों में यह सब्जी देखी जा सकती हैं। यहाँ तक कि पांच सौ किलोमीटर दूर से पधारे अध्यापकजी भी, अब इन सब्जियों के आदी बन चुके हैं। और इन दिनों बच्चों को ज्यादा मार्क्स देने लगते हैं।
सांगरी के विषय में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि इसे उबालकर और सुखाकर भविष्य में लम्बे समय के लिए आसानी से परिरक्षित किया जा सकता है।
कैर सांगरी चुगने से थोड़ी फुरसत मिली ही नहीं, कि बच्चों की मण्डली कमर में लौटा लटकाए हुए, साथ में बाल्टी, मग, चऊड़ी या ताम्बेड़िया लेकर जाळियों के झुंड में पूरा दिन भूखे-प्यासे, पीलू चुगने निकल जाती हैं। बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियां घर की चारदीवारी में कम और जाळियों पर लटकते हुए अधिक बिताते हैं। और सभी सांझ ढ़ले, पीलूओं से भरे बर्तनों के साथ हँसी-खुशी घर लौटते हैं।
अधिक संख्या में पीलू होने पर, इन्हें सुखाकर कोकड़ बनाई जाती हैं, जो कि रस-भरे पीलूओं का निर्जलीकृत रूप होता हैं। पीलू के प्रति अपार प्रेम को दर्शाती, रेगिस्थानी लघु दन्त-कथा का संक्षिप्त सारांश इस प्रकार हैं-
रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळियां रो ढ़िग।।
और इन बच्चों से थोड़ी कम उम्र के बच्चे, इन दिनों नीम की निम्बोळी से जेबें भरने में व्यस्त दिखाई देते हैं।
और अपने जीवनकाल की एक तिहाई उम्र पार कर चुका साफ़ाधारी वर्ग, अपना पूरा समय कोटड़ी में तास के पतों संग सूत कातने में बिताता है।
दिन ढ़लने के साथ-साथ लू की मार कम पड़ने लगती हैं। पारा कसम तोड़ने लगता हैं। रातें ठण्डी होने लगती हैं। और खुल्ला आसमान, तारों की रौशनी से जगमगाने लगता हैं। इन दिनों केवल रातें ही सुकून के सुरीले गीत गाती है, दिन तो खटारा गाड़ी पर सवार शहर लगते है।
(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)

(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)



Saturday, May 4, 2019

आखातीज या आखात्री पर्व

आखातीज, जिसे रेगिस्थान का अपना त्योहार माना जाता हैं। इस रेगिस्थानी पर्व की शुरुआत अक्षय तृतीया से लगभग पन्द्रह-बीस दिन पूर्व ही हो जाती हैं। बच्चों की मण्डली प्रातः जल्दी उठकर, बैलों के गले में बाँधी जाने वाली घण्टियों को लेकर, जोर-जोर से बजाती हुई सभी को सचेत करती हैं। और फिर वे सभी लकड़ी के बनाए हुए छोटे-छोटे हळो से रात भर सूखे धोरों पर, एक खेत की तरह हळ जोतते रहते हैं। और अपनी हरियल भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सभी बच्चे हल जोतते समय एक साथ, एक लय-ताल में गीत गाते रहते हैं-
आकड़े रो हळियो, नीम्बड़े री नाइ।
रमते-झुमते, बाजरकी ब़ाइ....।।
हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते रहते और बातें करते रहते। बच्चों की यह रोजमर्रा प्रक्रिया आखातीज तक सतत चलती रहती हैं।
आखातीज का त्योहार मुख्यतः तीन दिन चलता है। प्रथम दिन आँगन के चौक में बनी रंगोली पर अनाज के पांच छोटे-छोटे ढेर बनाए जाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रखी जाती हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखा जाता हैं। बच्चे सुबह जल्दी स्नान करके, रूमाल में गुड़ व आखा लेकर, गले में बैलों की घण्टियाँ लटकाकर, हळ जोतने धोरे पर इकट्ठा हो जाते हैं। वे हंसते-खेलते एक-दूसरे को गुड़ की मनुहारे करते हैं। तथा आने-जाने वाले ग्रामीणों को पौटली में से आखा देकर, उनका स्वागत सत्कार गुड़ खिलाकर करते हैं। और ग्रामीण भी बच्चों को सकारात्मक रवैये से इस बार अच्छी बारिश होने के सगुन बताकर उन्हें खुश करते हैं।
ग्रामीण अपनी-अपनी कोटड़ी के आँगन में अनाज के पांच छोटे-छोटे ढ़ेर बनाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रख देते हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखते हैं। और फिर सभी जनसामान्य कोटड़ी में चल रही रियाण में इकट्ठा होकर, एक-दूसरे को पर्व की बधाइयाँ देते हैं। इस दिन आगामी मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता हैं। तथा इस वर्ष सुकाळ रहेगा या अकाळ?, इसके सगुन एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। रियाण में अफीम गलाकर एक-दूसरे को मुट्ठी-भर पिलाने की मनुहारे करते हैं। इस दिन सभी विरोधी गिले-शिकवे व बेर भूलकर एक ही जाजम पर बैठते हैं। कोटड़ी में चल रही रियाण के लिए सभी घरों से खीच भरी थालियाँ व अन्य व्यंजन आते हैं। जिसे यहाँ की भाषा में तासळा कहते हैं। और फिर सभी बाजरे के खीच के साथ घी-गुड़, दही या कढ़ी लेकर एक-साथ बैठ भोजन करते हैं। फिर वे सभी एक साथ दूसरी कोटड़ी पधारते हैं, उनकी मनुहार, सगुन-परख व भोज-सत्कार मिळझुलकर साझा करते हैं। मांगणियार इस शुभ अवसर पर मनुहार व हर्षोल्लास के सुरीले गीत गाते हैं। कुछ समय पश्चात बच्चों की मण्डली जोर जोर से घण्टियाँ बजाती हुई, गांव की सभी कोटड़ियों में पधारती हैं, सभी हंसी-खुशी उनका स्वागत करते हैं, उन्हें बाजरे के खीच संग घी-गुड़, दही व कढ़ी भरपेट खिलाते हैं। इस दिन मुख्यतः सभी घरों में बाजरे का खीच ही बनाया जाता हैं। खीच बनाने के लिए एक दिन पूर्व, भीगे बाजरे को घर के आंगन में धंसी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता हैं। फिर इस कूटे हुए बाजरे को सुखा दिया जाता हैं। और अगले दिन पकाया जाता हैं।
पर्व का दूसरा दिन यानी दूज, भी हू-बहू प्रथम दिन(अमावस्या) की तरह ही मनाया जाता है।
पर्व का तीसरा व आखरी दिन अक्षय तृतीया, भी हू-बहू दोनों दिनों की तरह ही मनाया जाता हैं, किन्तु इस दिन मेहमानों को भोजन में बाजरे के खीच के स्थान पर गुळराब, घी-गुड़ में तैरते गेंहू के फाफरिये, कैर-सांगरी व ग्वारफळी की सब्जी के साथ-साथ दही-छाछ परोसी जाती हैं।
आज चीज़े बदलने लग गयी हैं। बुजूर्ग आधुनिक आखातीज के परिपेक्ष में व्यथा सुनाते हैं, कि "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच व घी से भरी रहती थी, किन्तु आज थालियाँ छोटी हो गयी हैं और खीच उससे भी कम"। पहले पूरी रात हल जोते जाते थे। रात भर बळधिया बनकर जोर-जोर से घण्टियाँ बजाते थे। किंतु आज के बच्चे अब अक्षय तृतीया को ही दिखते हैं। बड़ी वाली घण्टियाँ तो इन्होंने देखी ही नहीं हैं। आज आखातीज का यह त्योहार धीरे-धीरे सिकुड़ रहा हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore