Saturday, July 27, 2019

हाउड़ो

यह रेगिस्तान में प्रयुक्त होने वाला एक विशिष्ट शब्द है। जिसका उपयोग शिशु को आवश्यक व अनावश्यक कार्यों को रोकने या करवाने हेतु प्रयुक्त किया जाता हैं।
यह शब्द शिशुओं की खुशी, जिज्ञासा, इच्छा, क्रियाशीलता, उत्सुकता व अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता हैं। हाउड़े (एक काल्पनिक, काली-डरावनी शक्ति) का डर फैलाकर, बच्चे के व्यवहारिक अधिगम की ओर बढ़ते कदमों को पीछे खींचा जाता हैं। जिससे सभी जाने-अनजाने में अनजान बनते हैं। बस अपना काम निकालने के चक्कर में, वे बच्चे के मन में उम्रभर के लिए, एक डर पैदा कर देते हैं।
शैशवावस्था में शिशु अपने माता-पिता, रिलेटिव्स, परिवार या समाज के व्यक्तियों में से हाउड़े का जिक्र जरूर सुनता हैं। और उसे सच मानता हैं, क्योंकि यह इस अवस्था की एक अनुकरण-अधिगम विशेषता हैं। और एक अनजान,अज्ञात डर का ता-उम्र के लिए शिकार हो जाता हैं। प्रायः इसी डर के शिकार की वजह से बच्चे भूत, प्रेत, आत्माओं को भी मानने लग जाते हैं। जिसका खामियाजा उन्हें पूरी उम्र चुकाना पड़ता हैं।
वास्तविकता में, हाउड़े शब्द की कोई सत्यता नहीं होती हैं। यह महज एक वहम और काल्पनिक मनोदशा होती हैं। जिसका शिकार कुपोषण से कई ज्यादा घातक होता है।

Sunday, May 19, 2019

रेगिस्तानी लॉकर या रेफ्रिजरेटर

मिट्टी से बने इस ढाँचे को "कोठा" कहते है। इसके अलावा इसे रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर व फ़ूड लॉकर के उपनाम से भी जाना जाता हैं।
पुराणे जमाने में इसे "रेगिस्तानी लॉकर" के नाम से जाना जाता था। क्योंकि इसी में ही घी, मक्खन, रोटी, सब्जी, दूध, दही व अन्य उपयोगी खाद्य वस्तुओं को कौए, बिल्ली, छिपकली व अन्य सूक्षम विषैले जीवों से बचाकर सुरक्षित रखा जाता था। इसमें संग्रहित की गई वस्तुएं जैसे घी, मक्खन व इनसे निर्मित नास्ता, कई महीनों तक खराब नहीं होता था। जिस कारण इसे "रेगिस्तानी रेफ्रिजरेटर" के नाम से भी जाना जाता था।
इसके निर्माण में खड़ीन-खेत की चिकनी-मिट्टी के साथ घोड़े की लीड मिलाकर, छोटी-छोटी लुग्दियाँ तैयार की जाती हैं। फिर इस लुग्दी से धीरे-२, सम्पूर्ण सरंचना को रूप दिया जाता है। फिर इस कोठे पर ब़ील, कँगूरे तथा छोटे-२ गोल-तिकोने काँच के टुकड़े चिपकाकर, इसकी सुंदरता को ओर निखारा जाता हैं।
और पास में ही लकड़ियों के बंडल्स को रखने के लिए, कोठे से सटी हुई एक पागे(पैर) की ईंधणियाळी बनाई जाती है।
आज यह रेफ्रिजरेटर अपने अंतिम छोर पर है। आज के दौर में 'मिट्टी के इस कोठे' का स्थान इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर व वुड-मेड कठान्तरे ने ले लिया हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Monday, May 6, 2019

पीलू खाती धोरा धरती

मई-जून के दिन
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रेगिस्थान में मई-जून के महीने अपने संग लाते है, झुलसते गर्म दिन। मानो पारे ने तो कसम खा रखी हो, 45℃ से नीचे उतरना ही नहीं है। मई महीने के प्रारम्भिक हफ़्ते, रेत की आँधियों के शुरुआती दिन कहे जाते हैं। इन दिनों रेत से सनी हुई गर्म आँधियां, शुष्क वातावरण में चारों तरफ तैरती रहती हैं।
बावजूद इसके, रेगिस्तान का शुष्क वातावरण इन दिनों कैर-सांगरी,पीलू-कोकड़, पाका-खोखा जैसे अमूल्य मीठे फल व खाद्य व्यजंन प्रकृति-प्रदत करता है।
रेगिस्थानी इन दिनों, कैर-सांगरी की सब्जी खाने के शौकीन बन जाते हैं। बच्चे पूरा दिन झुलसती दोपहर में कैर व सांगरी चुगने में व्यस्त दिखते हैं। इन दिनों लगभग सभी घरों में यह सब्जी देखी जा सकती हैं। यहाँ तक कि पांच सौ किलोमीटर दूर से पधारे अध्यापकजी भी, अब इन सब्जियों के आदी बन चुके हैं। और इन दिनों बच्चों को ज्यादा मार्क्स देने लगते हैं।
सांगरी के विषय में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि इसे उबालकर और सुखाकर भविष्य में लम्बे समय के लिए आसानी से परिरक्षित किया जा सकता है।
कैर सांगरी चुगने से थोड़ी फुरसत मिली ही नहीं, कि बच्चों की मण्डली कमर में लौटा लटकाए हुए, साथ में बाल्टी, मग, चऊड़ी या ताम्बेड़िया लेकर जाळियों के झुंड में पूरा दिन भूखे-प्यासे, पीलू चुगने निकल जाती हैं। बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियां घर की चारदीवारी में कम और जाळियों पर लटकते हुए अधिक बिताते हैं। और सभी सांझ ढ़ले, पीलूओं से भरे बर्तनों के साथ हँसी-खुशी घर लौटते हैं।
अधिक संख्या में पीलू होने पर, इन्हें सुखाकर कोकड़ बनाई जाती हैं, जो कि रस-भरे पीलूओं का निर्जलीकृत रूप होता हैं। पीलू के प्रति अपार प्रेम को दर्शाती, रेगिस्थानी लघु दन्त-कथा का संक्षिप्त सारांश इस प्रकार हैं-
रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळियां रो ढ़िग।।
और इन बच्चों से थोड़ी कम उम्र के बच्चे, इन दिनों नीम की निम्बोळी से जेबें भरने में व्यस्त दिखाई देते हैं।
और अपने जीवनकाल की एक तिहाई उम्र पार कर चुका साफ़ाधारी वर्ग, अपना पूरा समय कोटड़ी में तास के पतों संग सूत कातने में बिताता है।
दिन ढ़लने के साथ-साथ लू की मार कम पड़ने लगती हैं। पारा कसम तोड़ने लगता हैं। रातें ठण्डी होने लगती हैं। और खुल्ला आसमान, तारों की रौशनी से जगमगाने लगता हैं। इन दिनों केवल रातें ही सुकून के सुरीले गीत गाती है, दिन तो खटारा गाड़ी पर सवार शहर लगते है।
(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)

(फ़ोटो : पीलू भरे बर्तन)



Saturday, May 4, 2019

आखातीज या आखात्री पर्व

आखातीज, जिसे रेगिस्थान का अपना त्योहार माना जाता हैं। इस रेगिस्थानी पर्व की शुरुआत अक्षय तृतीया से लगभग पन्द्रह-बीस दिन पूर्व ही हो जाती हैं। बच्चों की मण्डली प्रातः जल्दी उठकर, बैलों के गले में बाँधी जाने वाली घण्टियों को लेकर, जोर-जोर से बजाती हुई सभी को सचेत करती हैं। और फिर वे सभी लकड़ी के बनाए हुए छोटे-छोटे हळो से रात भर सूखे धोरों पर, एक खेत की तरह हळ जोतते रहते हैं। और अपनी हरियल भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सभी बच्चे हल जोतते समय एक साथ, एक लय-ताल में गीत गाते रहते हैं-
आकड़े रो हळियो, नीम्बड़े री नाइ।
रमते-झुमते, बाजरकी ब़ाइ....।।
हल जोतने के बाद वो रातभर खेलते रहते और बातें करते रहते। बच्चों की यह रोजमर्रा प्रक्रिया आखातीज तक सतत चलती रहती हैं।
आखातीज का त्योहार मुख्यतः तीन दिन चलता है। प्रथम दिन आँगन के चौक में बनी रंगोली पर अनाज के पांच छोटे-छोटे ढेर बनाए जाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रखी जाती हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखा जाता हैं। बच्चे सुबह जल्दी स्नान करके, रूमाल में गुड़ व आखा लेकर, गले में बैलों की घण्टियाँ लटकाकर, हळ जोतने धोरे पर इकट्ठा हो जाते हैं। वे हंसते-खेलते एक-दूसरे को गुड़ की मनुहारे करते हैं। तथा आने-जाने वाले ग्रामीणों को पौटली में से आखा देकर, उनका स्वागत सत्कार गुड़ खिलाकर करते हैं। और ग्रामीण भी बच्चों को सकारात्मक रवैये से इस बार अच्छी बारिश होने के सगुन बताकर उन्हें खुश करते हैं।
ग्रामीण अपनी-अपनी कोटड़ी के आँगन में अनाज के पांच छोटे-छोटे ढ़ेर बनाते हैं। अनाज के प्रत्येक ढ़ेर पर प्याज, गुड़ व रुई रख देते हैं। और अनाज के ढ़ेर के बीच में एक पानी से भरा लौटा व कांच रखते हैं। और फिर सभी जनसामान्य कोटड़ी में चल रही रियाण में इकट्ठा होकर, एक-दूसरे को पर्व की बधाइयाँ देते हैं। इस दिन आगामी मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता हैं। तथा इस वर्ष सुकाळ रहेगा या अकाळ?, इसके सगुन एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। रियाण में अफीम गलाकर एक-दूसरे को मुट्ठी-भर पिलाने की मनुहारे करते हैं। इस दिन सभी विरोधी गिले-शिकवे व बेर भूलकर एक ही जाजम पर बैठते हैं। कोटड़ी में चल रही रियाण के लिए सभी घरों से खीच भरी थालियाँ व अन्य व्यंजन आते हैं। जिसे यहाँ की भाषा में तासळा कहते हैं। और फिर सभी बाजरे के खीच के साथ घी-गुड़, दही या कढ़ी लेकर एक-साथ बैठ भोजन करते हैं। फिर वे सभी एक साथ दूसरी कोटड़ी पधारते हैं, उनकी मनुहार, सगुन-परख व भोज-सत्कार मिळझुलकर साझा करते हैं। मांगणियार इस शुभ अवसर पर मनुहार व हर्षोल्लास के सुरीले गीत गाते हैं। कुछ समय पश्चात बच्चों की मण्डली जोर जोर से घण्टियाँ बजाती हुई, गांव की सभी कोटड़ियों में पधारती हैं, सभी हंसी-खुशी उनका स्वागत करते हैं, उन्हें बाजरे के खीच संग घी-गुड़, दही व कढ़ी भरपेट खिलाते हैं। इस दिन मुख्यतः सभी घरों में बाजरे का खीच ही बनाया जाता हैं। खीच बनाने के लिए एक दिन पूर्व, भीगे बाजरे को घर के आंगन में धंसी हुई पत्थर की ओखली में लकड़ी के मूसल से कूटा जाता हैं। फिर इस कूटे हुए बाजरे को सुखा दिया जाता हैं। और अगले दिन पकाया जाता हैं।
पर्व का दूसरा दिन यानी दूज, भी हू-बहू प्रथम दिन(अमावस्या) की तरह ही मनाया जाता है।
पर्व का तीसरा व आखरी दिन अक्षय तृतीया, भी हू-बहू दोनों दिनों की तरह ही मनाया जाता हैं, किन्तु इस दिन मेहमानों को भोजन में बाजरे के खीच के स्थान पर गुळराब, घी-गुड़ में तैरते गेंहू के फाफरिये, कैर-सांगरी व ग्वारफळी की सब्जी के साथ-साथ दही-छाछ परोसी जाती हैं।
आज चीज़े बदलने लग गयी हैं। बुजूर्ग आधुनिक आखातीज के परिपेक्ष में व्यथा सुनाते हैं, कि "पहले थालियाँ बड़ी होती थी और वो किनारों तक खीच व घी से भरी रहती थी, किन्तु आज थालियाँ छोटी हो गयी हैं और खीच उससे भी कम"। पहले पूरी रात हल जोते जाते थे। रात भर बळधिया बनकर जोर-जोर से घण्टियाँ बजाते थे। किंतु आज के बच्चे अब अक्षय तृतीया को ही दिखते हैं। बड़ी वाली घण्टियाँ तो इन्होंने देखी ही नहीं हैं। आज आखातीज का यह त्योहार धीरे-धीरे सिकुड़ रहा हैं।
Photo : Mool Singh Rathore

Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore
Photo : Mool Singh Rathore

Tuesday, April 30, 2019

क्या तुमने देखा है?

कल का रेगिस्थान आज के वर्तमान से पूछता है, कि क्या तुमने देखा है?- प्रभातकाल में घरटी पीसती माँ की बाहों में ऊँघते बच्चे की खुशी, गोधूलि वैला में खुरों से खनकती खड़तालें, बकरियों की शोरगुल राग को काटती घेटियों की ममता, ढ़लती रात संग कुतों का अलसाना, जुगाली करती बेफिक्र साँसे, मोर मुकूट के मधूर गीत, ढ़लते सूरज को देख चिड़ियों का चहचहाना, पीलू चुगती दोपहर की लू, मिट्टी के बर्तन में मीठे होते कैर, भरी दोपहर में नासका सूँघती औरतें, सांगरी झाड़ते वक्त बच्चे की आंखों में खटकती भेड़-बकरियां, भेड़ो की ओर भागते घेटिये, ढ़लती साँझ के समय लकड़ियों से लदे जन्तरे लाते खर, प्रभात में घरटियों की बुलंद होती आवाजें, बिलोने में मक्खन को ताकती बिल्ली की नज़रें, गाय को नैयजण लगाती माँ को देखता बछड़ा, बाजरे की रोटी पर मक्खन लगाकर जांखळ करता गौधणी, दोपहर को कैर के चूंटे चुगकर अलग करती औरतें, सांढ़ के दूध को तपेले में पीते बच्चे की खुशी, गोधूलि वैला में गूंजती घण्टियों की आवाजें, चांदनी बरसाती ठण्डी रेतीली रातें, झर्र-मर्र करते झेरणे को ताकता कौआ, गेंहू के दलिये से बनी गाठ का झारा करता रेगिस्थान, दोपहर में ऊँठो की दौड़ लगाते सवार, खेजड़ी के सूखे खोखे चुगती औरतें, आक के पत्तो पर चाय पीता बणजारा, चलती कुदालों संग गूँजते हमरचे के गीत, मिट्टी के बर्तन में छाछ गटकते घेटिये, खोखली चारपाई में गुनगुनाते भँवरे, गूंगे के पैरों में धागा बांध उसकी उड़ान का पीछा करते बच्चे, ब्यालू करते समय कुत्ते की नज़रें, बैरी से बरत खींचते नंगे पैर, ऊँठो का अपार प्रेम-प्रसंग, दोपहर को झुलसती लू में कंधे पर लटकती पानी की दीड़ी, उड़ती स्वर्ण रेत के बवंडर, दोपहर को पानी से भरी पख़ाल ढ़ोता ऊँठ, मांगणियारों की खड़ताल संग खनकती ढोलकी का लयमयी तालमेल, तंदूरे संग कांसियों का संगम, आस्था की प्रसाद पर नज़रे जमाये कौए की एकटुकता, अडिग रीति रिवाज पर खरी उतरती साँसे, दानी पुरुष की आँखे, त्यौहारों पर सजती रियाणे, अपनत्व भाव से हाथ फैलाती मनुहारें, भाणी पर घिसते बरत के आकस्मिक टूटने से गूँजी आवाजें, ऊँठो की होड़ से उठता रेत-बवंडर, घोड़ों के एक साथ हिनहिनाने की खुशी, अरटिये से सूत कातती औरतों की एकरूपता, टूटी बरत को पकड़ते जुझारू आदमी का फड़कता दिल, दोपहर को कपड़ा टाँकी पानी की बोतल को सिराणे लगाकर ऊँघता मदमस्त ग्वाला, चीनी की प्लेट से चाय की चुस्की लेते वक्त धूजते झुर्रीदार हाथ, कठान्तरे में रखे मक्खन को निहारती बिल्ली की नजरें, भेड़ो पर चलते कातीये, रलियाँ सीलती औरतों की मण्डली, निम्बोळी के झांरे को लेकर भागता बचपन, रात्रिकालीन जागरण में बजते तन्दूरे की राग, दीपावळी को मतीरे अन्दर जलता दीया, रोते बच्चे के माथे से जूएँ निकालते झुर्रीदार हाथ,मनुहार के सुरीले गीत, मोर पंख को ढूंढ़ते बच्चों की आतुरता।
(Photo : Mool Singh Rathore)

Saturday, April 27, 2019

गुजरे वक़्त की वर्तमान से भिड़त

वर्तमान रेगिस्थान के परिपेक्ष में, नब्बे वर्षीय वृद्ध अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए, अपने संग बुढ़े हुए रेगिस्थान की आज से तुलना कर कहते हैं, कि-
ओ बख़त बह गया,
बातां गयी बिसर।
कदेक अवळू आवसी,
जो बैठा चितर।।
फ़ोटो : चितरिंग बा
दिन गया दीसता, रूपाळी गई रातां।                   
करता बैठा डोकरा, जुग जूने री बातां।
गया पाणी पीवता, खोफ़ खारो खावता।
हमें वारों आपरो, कह गया जावता-जावता।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०१)

रेता जिथिये रत उथीये, रया जांतरा हाल।
हिणा देखता उथिये, तो घणा बळे आन्तरा।
उठ सामां आवता, सुगन मिळता सांतरा।
हिंयो हुलाती हँसता, उथीये किस्सा भ्रांत-रा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०२)

पेल नैण परखता, पाछे परखता भ़ेण।
कोस भर आता लैण, सामां देखत सैण।
हँसे कोडे धापता, रेता कई-कई रैण।
उगे-आथवें री भाण नहीं, जद बैसता मन री कैण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०३)

बेसण राखता बाजठो, हाथ जोड़ होशियार।
माथे नेह राखता, प्राण कर न्योछार।
भोजन थाळ भरावता, कर-कर डोढ़ी मनुहार।
लाड कोड सूं जिमावता, दे-दे कोळीया चार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०४)

काले पिरा जावजो, रहो आजोड़ी रात।
थे कद पाछा आवसो, करा मन री बात।
ओ दिनड़ा दूर गया, गयी मदरी रात।
संग छूटा सैणा रा, रयी मन री बात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०५)

मन मिळतो मानखो, जिथिये गुण मिळता ज्ञान।
साम्भळता दे-दे ध्यान, कर-कर ऊभा कान।
मोह मिळे नहीं मान, उथिए गयी आन।
आज बातां ऊभरी, छूटा कदरदान।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०६)

आवता देख ऊठता, मिळता गळ-बाँह दे।
उथीये देख ऊँगाणा, अपणापण रो आयो छे।
तेल खुटा दीप का, छूटा नाता-नेह।
बिन बादळ-बिन बिजळी, केड़ा बरसे मेह।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०७)

केना का-कुण सुणे, मन अपणे री बात।
जिको साथी संग रा, छुड़ाय गया हाथ।
मिनख गया मोकळाए, गयी मिनखा री बात।
ऊमर साथे उधारणा, गहरी कर गया घात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०८)

मगरे बेस मोरिया, कळाक करता जोर।
आज उथिये बैठा, गुगू देवे घोर।
अमलां साथे ऊठता, गळता चारे पोर।
ओ ओतारा उठ गया, गासण खा गया ढोर।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(०९)

हैमर जिथिये हींसता, रींजता जिथिये राज।
उथिये ऊभा आज खर, भान्ध मोटे भूँके।
कविया-गविया चल गया, राग-रागिणे सूके।
आज उथिये कूतरा, कर मूंह ऊंचा कूके।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१०)

कवियां संग कोयलां, करती जिथिये किलोल।
श्रवण साखरा लागता, हिंयो देतो हिलोल।
छंद गाजता चारणा, भाट चोपड़ा खोल।
कविये छोड़्या बोल, जिथिये जाणे नी कोई मोल।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(११)

झेडर,अरणी,रायचन्द,चिरमी,डोरो चसिया।
मणिधर,मखणो,मोरियो, विरहीजण राग उदासिया।
ओ मैरासी मर गया, जो रहता राज मन बसिया।
कविया-गविया की करे, गया राग पुछाण रसीया।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१२)

नर-नगारा गूँजता, जोगिये मुरली जाण।
ढोल-डांडिये रमता, घोळ कर घमसाण।
चंग हूंगरे चालता, पैरुवे पाबा पिछाण।
बंशी मदरी बाजती, ऊँची थळीये आण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१३)

धड़ उठता भड़कता, आता कोई काज।
दुःख दूजैरा देखता, सुख आपरा साज।
धीरज घण बंधावता, राख हींये राज।
उथिये दीठा आज, लोको छड गया लाज।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१४)

सूखा जिथिये सरवर, उथिये पीयण री आश।
मन के मैड़ी चड़ा, जाऊं सैणा रे पास।
ओ मनख मिट गया, होत गया हतास।
हेत प्रीत के कारणे, भूला फिरे उदास।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१५)

जिके रूंखड़े चकुओ-चकवी, करता रैण निवास।
परबीति पड़्या सुणावता, काढ़ मुख मिठास।
पग पाळा पंथिया, सुख रा लेता स्वांस।
ओ रूंखड़ा रुळ गया, उड़ गया पंछी आकाश।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१६)

गऊवां दुहाड़ती गोरड़ी, होता बिलाणा हमेश।
दूध-दही रा दरिया, बेहता जिथिये विशेष।
लौटो छाछ रो रावळे, उथिये दीठो अवेश।
मुंह उतार मानखो, दर-दर फिरे दरवेश।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१७)

रूड़ो सावण भादरो, मेघ मलार गावतो।
निर्मल नीर अपार, मनख मवेशी पावतो।
गाज घण कर जावतो, झड़ी मेह बरसावतो।
रूड़ो धरणी रूप, जिथिये इन्दर देखण आवतो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१८)

छीलर टोभा छलकता, दे-दे लाँबी उछात।
देख मन मुळकता, हिंयो देतो हुलास।
तालर देख तिड़कता, अँखिये सूखी आश।
उथिये सूखो आज, घण हरियो भात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(१९)

हळ भेळो हमरचो, जिथिये नैदाण काढ़ता लासिया।
राणलिये संग खूँटता, जिथिये महीड़े संग माणसिया।
ऊँवा धा़गा मी आज, धान गया सुहातिया।
मोठ-मूँग-तिल-रांसड़ा, ग्वार गयो कर गासिया।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२०)

कड़िये कनक पाकती, ऊँठ डूब बाजरा।
भर भा़रां घर लावता, भोम लिख्या भाग रा।
ऊँवे पोळछे पाण छड्यो, धरती छड्यो धान।
आभे रंग-रूप छड्यो, मड़दे छड्यो मान।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२१)

काठे खेत री तिंडसी, स्वाद देती साखरा।
ग्वार-फल्ली संग जीमता, कर तूम्बा रा खाखरा।
चोखी चीभ़ड़ी चीरता, आबू चाखता आक रा।
लोभ मन ललचावता, काळीग मतीरा काचरा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२२)

आम्बा आम्बली पाकता, बोरड़ीये राता बोर।
गूंदिये गूंदा झूलता, जाळीये पीलू जोर।
गूंद-चापटिया कूमटे, खेजड़िये खोखा खोर।
नीम्ब निम्बोळी नाचती, कैर-पाका रो थो दौर।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२३)

चौमासे मी चाखता, खुम्भा-खुम्भी घणा।
मामा मोळी मरेड़ो, घोलांह करेला चणा।
पीता चाखता पांतळी, काचा गाघेटा हरा।
धोरे जोगीड़ा झूलता, गूँढ़ीर बूँठा तणा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२४)

बिजळीयाँ- बैलज्जियाँ, आभा तिना लाज।
म्हारो बालमो घरे नहीं, तूं घोर दे मत गाज।
आक रे डोडे-भीम रे गोडे, भीम सराय-भीम सहाय।
ओ बरसाळा बीत गया, शबद गया साज।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२५)

चम्पो मरूओ केवड़ो, सुगन री सँभाळ।
गहरी छाया फळ घणा, डाळा घणा विशाल।
याद आवे बातड़ी, ऊभा सरवर पाळ।
ओ झाड़खा झड़ गया, दीठा घणा डुकाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२६)

पग-पल्लकाँ-पाधरे करता, ओ प्रेम प्रकाश।
आज उथिये प्रीतड़ी, गयी कोस पच्चास।
मिनख निको मिरू, ऊँवा मड़ा मी आज।
मीठा मोर पपैहिया, बोलता बारह मास।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२७)

ऊँठ बघिया झूलता, पीतल जड़्या पळाण।
थुंभी डूंगरा दीसती, काळा कैश कपाळ।
गादिये गुलड़ा शोभता, पड़छी पल्ला चार।
गासिये कर हालता, डोढ़ा तंगड़ा ताण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२८)

गोडे गोडीया बाँधता, गळीये गूघर माळ।
मुखड़े मोहरा चाड़ता, बगसे जड़ी मुहार।
माथे बैठ शोभता, मुच्छ बंकी मोटियार।
हींचक हीले हालता, दे सज्जण घर ज्वार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(२९)

घणथुंभी थूळ जाती, लारोलार भै़कर।
भे़गर बकरा भा़ढ़ती, सांख खेजड़िये चार।
ऊँवे साँढ़ीये आज, पड़ी वक्त री मार।
ओ मईड़ा मर गया, पाकेट कपरे पार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३०)

घण लरड़ी-घण बाकरी, घर-घर घणो धण।
गाँया गोरड़ी-चार मोरड़ी, दूधे भर-भर थण।
ऊन ओरड़ी-जट कोटड़ी, कातता कई-कई मण।
छांगा-ढूळा ढ़ळ गया, गया ग्वाल गैडियाँ खण।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३१)

मिळ मोकळा जूना डोकरा, काळी कातता जट।
गाँव-गाँमड़े पाळा पूगता, मोटियार ना के हट।
एक बोलता चार आवता, काम करता झट।
मड़दे गयो मट, जिथिये रयो पद रो भ़ट।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३२)

माथे चाड़ माळे, गोफ़ण गिलोला मारता।
ठक्का पड़तो ताट रो, पड़्या झाड़ उडावता।
लूखी-सूखी सुख री, कांदे साथे खावता।
ओ दिनड़ा देश रा, मदरा-मदरा जावता।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३३)

रातीये भरियो टुबकियो, सैड़िये दिनो सिग।
माँ मरे मैहराणे री, घणो जाळा रो ढिग।
अँगूर धाट धरा रा, पीलू पीळा टिग।
कोडे कोकड़ खावता, किसमिस थली सिग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३४)

तूं तळे री धणियांणी, भे़गो कर भ़च्चा।
पैयाळ पाणी काढ़ता, कर-कर हऊ पच्छा।
भै़ंसी बरत भा़ळता, कोस भरता कच्चा।
जांतरा भर लावता, साथीड़ा गदिया सच्चा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३५)

दूध ताणिये-अट्टो टसीये, रोटी धा़न्गी धार।
लूण कुलड़ी-खट्टो लोटकी, दही माटला-मार।
गाठ हांडिये-डोई मंडिए, खाता कांसीये ठार।
आँगण राखता आँथणी, माथे ढ़ाबरो ढ़ाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३६)

चोक बोरीयो चाड़ता, बोरी बू खुथी।
जालंग जोर भरावता, माथे रेवे सुती।
जठ-ओठे री जीरोई, कौशल पैरता जुती।
आज साधन अणुता, पण ओ बात उती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३७)

दीप मन रा दीपावती, रूड़ी रैण रिझावती।
ओछो शोर, प्रीत घणी, देश दीयाळी आवती।
छोटो-मोटो काच्चर मीठो, कोठा धान भरावती।
घण शोर गरजावती, दीसे रीतां जावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३८)

हळीये खेत खेड़ावती, टाबर टोळी कहलावती।
परब हाळीयो पाळती, समझू सुघन सुझावती।
खीच बाजरियो खावती, आखातीज आवती।
ब़ीला भैळी भागती, गुळभाणी गयी गावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(३९)

गैर फागण गावती, हर्षे होळी आवती।
कोडे पेहळाद काढ़ता, झाळ लंक दिश जावती।
जोत चूल्हे भे़ळता, चिटक सुगन चड़ावती।
आज धुडे़ली आवती, फिरे मुँह लुकावती।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४०)

तीज-तीजणी राखती, उभछठ ऊभी रात।
घण गजुआ तैरावटी, जीमती सतुवे साथ।
ईसर ऊजती-गवर पूजती, गणगौर घुड़ला घात।
राख निर्जळ ग्यारस, करती कानूडे़ री बात।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४१)

तीस रोज़ा राखती, उथिये आती ईद।
मिळ मुबारक देवता, ध़र्ष अँखिये धी़द।
बांघ मुल्ला बोलता, सजदा कर मुर्शिद।
आज निरणा नमाज नी पढ़े, मुँह उतारे मस्जिद।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४२)

साफ़ा पेर सतरंगियाँ, तेवटे दोढो़ पल्लो।
काँधे आंगोछाे राखता, दे आडो टल्लो।
भरतल पेरता मोजड़ी, वेश लागतो भलो।
पेट पाटला मोटियार, घणाे राखता झलो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४३)

काने पेर मुरकी, गोखरू सोन-सरा।
दांते कील सौने री, कळाई चोखा कड़ा।
आंगळीये पेर छलड़ा, अंतर फूम्भा अड़ा।
काछ-कंघों-गोलड़ो, रूमाल राखता बड़ा।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४४)

मट राखता मड़दे, झट उठता झाळ।
प्रीत राखता पड़दे, किस्मत लिखी कपाळ।
पाणी राखता पेट, झगड़ो नहीं झिकाळ।
जाता युद्धा मी थेट, छाती कर विशाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४५)

प्रीत-रीत पाखी पड़ी, पड़्या पेट पम्पाळ।
आपो-आप री गरजड़ी, सैणे केड़ी संभाळ।
अँखिये रंग उतरियो, पाणी ढ़ल्यो परणाळ।
हिंया हिम्मत हार मत, देख घणा डुकाळ।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४६)

मन मलाखड़ो, घणो साखरो, बांध रमता संधरे।
भेरू-भलो, झाल-पल्लो, कब्बडी पाळा कपरे।
जेर-लाम्बड़ी, ब्याई-गाजड़ी, रमता रात दिन रे।
दड़ी-दोटा, छोटा-मोटा, रमता इट्टी-डक्करे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४७)

भोपा धूणता- भा़ण खणता, पग पावळीया तणे।
पाप भागता- जिम्मो जागता, कांसिया तम्भूरा खणे।
खण तम्भूरी- पड़ पाबू री, भील सुणाता भणे।
छन्द चारणे- भाट चोपड़े, आवता आदर घणे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४८)

चार चतर गुण नारियां, बेसती ठोड़ बुहार।
बूढ़ा देख आवता, चालती खण तेजार।
आज उथिये धोतिये, करयो खूब बिगाड़।
बैल्लज करे बातियाँ, ऊंचो पेट उगाड़।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(४९)

बेड़ला घण ऊँचावती, बैठी कातती सूत।
घण घरटी पीसती, पेट मांही पूत।
ओ जरणी जिलमती, सुघड़ नर सपूत।
आज आठ मन्थ सोवती, काढ़े घणा कपूत।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५०)

कन पनड़ी - पग पोलरी, पायल नैवरा संग।
कड़ कन्दोळो - उर बाड़लो, नथ नक रो नंग।
माथे बोरड़ो - नीचे टीकड़ों, झूमर सरा संग।
रंग रूड़लो - हाथे चूड़लो, रूड़ो राखती रंग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५१)

पेर काँचळी - माथे कुड़ती, ओटण गोटेदार।
पग हिंगळू - हथ मैंदी, माथे सिंहड़ों सार।
गूँथ मिढ़ली - लाँबी चोटली, कांकण डोरा धार।
काढ़ घुंघट - सोहणी सुघट, चालती चतर नार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५२)

सासू-सुसरो सेवती, फिरे उठ पगे लाग।
जेठ-देवर जाणती, आँगण मोटो भाग।
नणद-भोजाईयाँ गावती, काढ़ दैयाणो राग।
आज घर भांगे भूतणी, आधी रातां जाग।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५३)

प्रभात उठ पीसती, कनक बाजरी ज्वार।
दिन उगे दीसती, ऊभी भा़डों ब्वार।
पोर दिन चड़ता, रोटी मिळती तैयार।
दोपहर पहला पूगती, भातो खण भतवार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५४)

खुल्ला कैश, माथो उगाड़ो, टीलड़ी निको टीलो।
मुठियो निको खंच, वे़श पेरे बेरंगीलो।
बातां करे विशाळ, मुँडो कर-कर ढी़लो।
राता होठ रंगे घणा, ओढ़ पोमचो पीळो।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५५)

बीतण वाळा बीत गया, आवण वाळा आगे।
चल रया सो चोखा है, फेर नी आवे सागे।
अणहोणी होवे नहीं, मेहर मालक सूं मांगे।
सूता पैलाह समरिया, सुख भरी नींदा जागे।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५६)

चार दिनां री चानणी, आगे किती क बार।
देश दैयाणो छूट गयो, नयो जग संसार।
ओ बख़त ओर हता, ओर हता नर-नार।
सांइयाँ तांजी सुरत ना, नमन बारम्बार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५७)

मनख जाणे हूं करा, करण वाळो कोय।
मनख बापड़ो कांई करे, हरि करे सो होय।
अकळ आपणी बोळी, काम नी आये कोय।
पल मी उलट-पुलट करे, दुनियां ऊभी जोय।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५८)

घण गया, घण जावसी, और कई नर आवसी।
सत्संग से साथ बैठ, जो गुण गोविंद रा गावसी।
चतर बैठ चौक मी, चर्चा धरम कर चावसी।
सुख-शांति घर घणा, बैठा गंगा नहावसी।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(५९)

घड़ी जावे, पुळ जावे, जावे बख़त री भा़र।
कुदरत रे कारणें, जुग जावे चार।
बोल भलाई जावे नहीं, सदा रेवे सँसार।
भीम कहे जगदीश हरे, किरपा कर किरतार।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(६०)

बख़त साथी पूरी थई, भाईड़ा राम-राम।
बोल्या चाल्या माफ करजो, याद करजो जाम।
नेक-नीति साथे राखजो, करो घणा काम।
आप बैठा आनंद करो, ले धणी रो नाम।।
ओ बख़त बह गया......जो बैठा चार चितर।(६१)

And finally a happily End..🌸

Wednesday, April 10, 2019

मनगढ़त बहादूरी का विमोचन

रेगिस्थान के लोग आस्थाओं के अस्तित्व को सिद्ध करने हेतु अफवाहों की मनगढ़त कहानियों का सहारा लेते हैं। वे अपनी बहादुरी के मनगढ़त किस्से गर्व के साथ सुनाते हैं। वे अपनी बलिष्ठ बाजुओं से भूतों के साथ, रात भर खेली गई कुश्ती की कथा का सुबह कोटड़ी में विमोचन करते हैं। तथा अन्य सभी को विश्वास दिलाते है, कि वे भी बहादुरी की मिसाल हैं। वे भूत के उल्टे पैरो से लेकर उसके रंग-रूप तक का बारीकी से विवरण करते हैं। कहानियों का दौर चल ही रह था, कि इतने में एक दीपक के अचानक गायब होने की दूसरी कहानी शुरू कर दी जाती हैं। कि जब कभी वे अपनी गाय या भेड़-बकरी को ढूंढ़ने निकल जाया करते थे, तो रात के समय एक जलता हुआ दीपक उनका पीछा करता था और फिर वह अचानक ही वहां से गायब हो जाया करता था।
इतने में चिलम की फूंक लगाते हुए, अस्सी वर्षीय चुतरिंग भी अपनी कहानी सुनाते हैं, कि कैसे उन्होंने भूतों के पूरे झुण्ड को मात दी थी। और फिर सभी अपने-अपने बहादुरी के चर्चे चिलम की फूंक लगाते हुए बताने लगते हैं। तथा एक दूसरे की बहादुरी के बखाण करने लगते हैं। वे आस-पास के अन्य गांवों के भी चर्चे सुनाते हैं। वहां के बलिष्ठ बाजुओं की जमकर तारीफें करते हैं। वे समीपवर्ती गांव के किसी रतनिंग की कहानी बताते हैं, कि वे इतने बहादूर थे कि भूत की छाती पर रात भर बैठे रहे थे। भूत उनसे हाथ जोड़, विनती करते हुए अपनी जान बचाकर भागा था।
यह सब सुनते ही मुझसे रहा नहीं गया, मैंने तुरंत पूछ लिया कि क्या भूतों में भी जान होती है? और होती भी है तो क्या वे इतने विनम्र है, कि हाथ जोड़कर विनती करते है? इतना सुनते ही सारी घूरती हुई नजरें एक साथ बोल पड़ती है, कि अभी तू बच्चा है।, तूने दुनियाँ नहीं देखी हैं।, भूतों की बातें खुल्ले आम नहीं किया करते हैं। चल अब बहुत हो गयी है तैरे लिए कहानियाँ, जा हमारे लिए चाय लेकर आ। और चिलम के उठते धुँए के साथ-२ मुझे भी वहाँ से गायब कर दिया।
लेकिन वास्तविकता तो यह है कि लोग आस्थाओं को जुती की ठोकरों तल्ले बुनते हैं। झूठी प्रशंसा के चक्कर में अफवाहों को हवा देते हैं। वे विज्ञान की भाषा को पूर्णतः नकारते हैं। वे विज्ञान को मात्र किताबी ज्ञान बताकर उसकी व्यापक वास्तविकता को नकारते हैं। और अन्ततः अपनी ही बात पर अडिग रहते हैं। अगर कोई उनसे हिम्मत जुटाकर कह भी दे, कि हे! सज्जन आप गलत हो। तो वे उसे ज्यादा क़िताबों के पढ़ने का असर बताकर, पागल घोषित कर देते हैं।
फ़ोटो : चुतरिंग बा

#विज्ञानबनाममानव।